
जबलपुर। शराब कारोबार में इस समय दो गुटों के बीच भारी टकराव की स्थिति बनी हुई है। मुख्य विवाद सिंडिकेट के खर्चों के हिसाब को लेकर पैदा हुआ है। पहले गुट के पास जिले की करीब 70% दुकानें हैं, जो लंबे समय से भोपाल और जबलपुर के 4 से 5 बड़े आबकारी अधिकारियों के संरक्षण में सिंडिकेट चला रहा है। इस गुट पर आरोप है कि यह पुलिस और पत्रकारों को शांत रखने के लिए हर महीने 50 से 60 लाख रुपये खर्च करता है। दूसरा गुट, जिसके पास बहुत कम दुकानें हैं, इस खर्च के हिसाब को मानने से इनकार कर रहा है। दूसरे पक्ष का कहना है कि वे अपनी राशि सीधे देंगे, न कि किसी सिंडिकेट के जरिए। इसी वर्चस्व की लड़ाई के कारण जबलपुर में शराब की खुलेआम ओवर रेटिंग जारी है और शिकायत के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। सालों से शराब सिंडिकेट चलाने वाले ठेकेदार को अधिकारियों का ब्लाइंड सपोर्ट प्राप्त है
पैसे के बंटवारे पर छिड़ा घमासान
शराब सिंडिकेट के भीतर चल रही इस खींचतान की मुख्य वजह करोड़ों रुपये का लेनदेन और उसका हिसाब है। 70% दुकानों पर कब्जा रखने वाला पहला गुट इस धंधे को अपने पुराने ढर्रे पर चलाना चाहता है, जिसमें भोपाल से लेकर स्थानीय स्तर के रसूखदार अधिकारियों का उसे पूरा साथ मिल रहा है। इस पहले गुट का दावा है कि व्यवस्था बनाए रखने के लिए हर महीने 50 से 60 लाख रुपये बांटे जाते हैं। वहीं, कम दुकानों वाला दूसरा गुट अब इस सामूहिक खर्च में हिस्सा देने को तैयार नहीं है। इस गुट का साफ कहना है कि वे किसी भी तीसरे माध्यम के जरिए भुगतान करने के बजाय अपने स्तर पर प्रबंधन संभालेंगे। हिसाब सार्वजनिक होने के डर से अब बड़े चेहरों के बेनकाब होने का खतरा मंडराने लगा है।
शिकायतों पर नहीं हो रही कार्रवाई
इस आपसी गुटबाजी का सीधा असर शहर की कानून व्यवस्था और उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है। रसूखदार गुट के प्रभाव के कारण पूरे जबलपुर जिले में शराब की दुकानों पर तय कीमत से अधिक दाम वसूलने यानी ओवर रेटिंग का खेल खुलेआम चल रहा है। आम जनता द्वारा लगातार की जा रही शिकायतों के बावजूद आबकारी विभाग और स्थानीय प्रशासन पूरी तरह मौन साधे हुए है। जब दूसरे गुट ने इस मनमानी और हिसाब-किताब पर उंगली उठाई, तो उनके खिलाफ आबकारी अमले को आगे कर दिया गया। अब छोटे गुट की दुकानों पर दबाव बनाने के लिए अनावश्यक रूप से कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाइयों का सहारा लिया जा रहा है, जिससे टकराव और बढ़ गया है।
भोपाल तक पहुंची समझौते की कोशिशें
जबलपुर से शुरू हुआ यह विवाद अब राजधानी भोपाल के गलियारों तक पहुंच चुका है। दोनों पक्षों के बीच बढ़ते तनाव को देखते हुए बड़े स्तर पर डैमेज कंट्रोल यानी मामले को रफा-दफा करने की कवायद तेज हो गई है। बड़े अधिकारी और सिंडिकेट के संचालक इस मामले को जल्द से जल्द शांत करना चाहते हैं, क्योंकि मामला बढ़ने पर कई रसूखदार चेहरों के नाम सामने आने की आशंका है। इसके विपरीत, छोटा गुट पीछे हटने को तैयार नहीं है और वह इस सिंडिकेट व्यवस्था को खत्म कर स्वतंत्र रूप से काम करना चाहता है। इस गतिरोध के कारण फिलहाल मामले का कोई स्थाई समाधान निकलता दिखाई नहीं दे रहा है और जमीनी स्तर पर तनाव बरकरार है।
