
शशिकांत ओझा, मुख्य जनसंपर्कअधिकारी,मप्र पावर ट्रांसमिशन कंपनी,ट्रांसको
कोचिंग संस्थानों को लेकर नया एक्ट बनाने की चर्चा चल रही है। विशेषज्ञ इस बात पर जोर दे रहे हैं कि छात्रों के तनाव को कम करने के लिए उसमें विशेष प्रावधान हों। निस्संदेह, छात्रों का मानसिक स्वास्थ्य महत्वपूर्ण विषय है।लेकिन असली सवाल कहीं और है। सवाल यह नहीं है कि कोचिंग संस्थानों के लिए एक्ट होना चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि क्या आज की कोचिंग व्यवस्था शिक्षा में समान अवसर की अवधारणा को चुनौती नहीं दे रही है? जेईई, नीट, आईआईएम, यूपीएससी और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के परिणाम आने के बाद अखबारों और सोशल मीडिया पर कोचिंग संस्थानों के विज्ञापनों की बाढ़ आ जाती है। हर संस्थान अपने सफल छात्रों की तस्वीरें दिखाकर सफलता का दावा करता है। इससे यह संदेश जाता है कि बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता के लिए कोचिंग लगभग अनिवार्य हो गई है।
लेकिन इन कोचिंग संस्थानों की फीस कितने परिवार वहन कर सकते हैं?
आज लाखों रुपये खर्च करने की क्षमता रखने वाले परिवारों के बच्चे बेहतर कोचिंग, बेहतर मार्गदर्शन और बेहतर संसाधनों तक पहुंच बना पा रहे हैं। दूसरी ओर, सीमित आय वाले और गरीब परिवारों के अनेक प्रतिभाशाली बच्चे केवल आर्थिक कारणों से इन सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं। यदि किसी छात्र की सफलता का रास्ता उसके परिश्रम से पहले उसके परिवार की आर्थिक स्थिति तय करने लगे, तो यह सामाजिक समानता के लिए गंभीर चुनौती है।
तनाव कम करने के उपाय जरूरी हैं, लेकिन उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हम ऐसी व्यवस्था बना सकते हैं जिसमें हर प्रतिभाशाली बच्चे को, उसकी आर्थिक स्थिति चाहे जो भी हो, समान अवसर मिल सके? जब तक गुणवत्तापूर्ण तैयारी केवल उन लोगों की पहुंच में रहेगी जिनके पास पर्याप्त पैसा है, तब तक शिक्षा में समानता और अवसर की बराबरी का सपना अधूरा ही रहेगा। चिंता केवल कोचिंग संस्थानों के नियमन की नहीं, बल्कि शिक्षा में बढ़ती आर्थिक असमानता की भी होनी चाहिए।
