
जबलपुर। जबलपुर को महानगर बनाने का महत्वाकांक्षी दावा नगर पालिक निगम की आपसी सियासी जंग और अंतर्विरोधों के दलदल में धंस गया है। शहर की सरकार कहलाने वाली मेयर इन काउंसिल यानी एमआईसी के पूर्ण गठन को लेकर मचे घमासान के कारण पिछले लंबे समय से ५ महत्वपूर्ण कुर्सियां पूरी तरह खाली पड़ी हैं। सदन में सालों का लंबा संसदीय अनुभव रखने वाले कद्दावर और वरिष्ठ पार्षदों की एक बड़ी फौज मौजूद है, लेकिन कुछ रसूखदार स्थानीय नेताओं की हठधर्मिता और आपसी अहम् के टकराव के कारण उन्हें जानबूझकर दरकिनार कर दिया गया है। इस आंतरिक शह-मात के खेल के आगे सत्ताधारी भाजपा संगठन भी पूरी तरह लाचार और नतमस्तक नजर आ रहा है, जो बार-बार चेतावनी के बाद भी इन खाली पदों को भरवाने में नाकाम रहा है। इस राजनीतिक खींचतान का सीधा खामियाजा शहर की भोली-भाली जनता को भुगतना पड़ रहा है। वर्तमान नगर सरकार के पास अभी भी लगभग डेढ़ से दो साल का कार्यकाल बाकी है, लेकिन इस गंभीर गतिरोध को देखकर विकास की सभी योजनाएं धरातल पर पूरी तरह खोखली साबित हो रही हैं।
पांच खाली विभागों के कारण थम गई फाइलों की रफ्तार
एमआईसी को स्थानीय सरकार की कैबिनेट का दर्जा प्राप्त होता है, जिसके पास करोड़ों रुपए के वित्तीय और विकास कार्यों के प्रस्तावों को मंजूरी देने का असली अधिकार होता है। इन ५ महत्वपूर्ण विभागों में प्रभारियों की नियुक्ति न होने से नगर निगम मुख्यालय में जरूरी फाइलों का अंबार लग गया है। पानी, बिजली, सड़क और सीवरेज जैसी बुनियादी जनसुविधाओं से जुड़े बड़े प्रोजेक्ट्स पूरी तरह वेंटिलेटर पर आ चुके हैं। बिना जनप्रगतिशील मुखिया के चल रहे इन विभागों में प्रशासनिक अफसरशाही पूरी तरह हावी हो चुकी है, जिससे आम जनता के रोजमर्रा के काम दफ्तरों के चक्कर काटने में ही अटक गए हैं।
कद्दावर पार्षदों की अनदेखी से सुलग रही असंतोष की चिंगारी
नगर निगम सदन में लगातार कई बार से भारी मतों से जीतकर आ रहे ऐसे वरिष्ठ पार्षद मौजूद हैं जिन्हें शहर की भौगोलिक और व्यावहारिक समस्याओं की गहरी समझ है। इन योग्य और जनाधार वाले नेताओं को एमआईसी में जगह न देकर उनके लंबे राजनीतिक अनुभव को सीधे तौर पर नजरअंदाज किया जा रहा है। अब यह बात पूरी तरह साफ हो चुकी है कि शहर के विकास से ज्यादा कुछ बड़े नेताओं को अपने व्यक्तिगत अहंकार की संतुष्टि की चिंता है। सीनियर पार्षदों को हाशिए पर धकेलने की इस रणनीति से पार्टी के भीतर भी अंदरूनी बगावत का माहौल बनने लगा है।
हठधर्मिता के आगे बेबस संगठन की साख दांव पर लगी
इस पूरे सियासी ड्रामे में सबसे बड़ा सवाल संगठन की कार्यप्रणाली पर खड़ा हो रहा है। पीड़ित और उपेक्षित पार्षदों द्वारा कई बार सामूहिक रूप से अपनी बात शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचाई जा चुकी है, लेकिन कुछ स्थानीय क्षत्रपों के वीटो पावर के आगे संगठन पूरी तरह बेबस नजर आ रहा है। डेढ़ से दो साल का कार्यकाल बाकी होने के बावजूद कैबिनेट का खाली रहना यह साबित करता है कि अनुशासन का ढोल पीटने वाली पार्टी के भीतर गुटबाजी चरम पर है। यदि अब भी इन ५ कुर्सियों को नहीं भरा गया, तो महानगर का सपना सिर्फ एक चुनावी झुनझुना बनकर रह जाएगा।
