
जबलपुर। जिला अदालत ने धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश के गंभीर मामले में नामजद आरोपी सतीश सनपाल को दिया गया अग्रिम जमानत का संरक्षण खत्म कर दिया है। अपर सत्र न्यायाधीश केके मिश्रा की अदालत ने पुलिस की अर्जी पर सुनवाई करते हुए यह बड़ा फैसला सुनाया। मामले की जांच कर रही लार्डगंज थाना पुलिस ने कोर्ट को बताया कि आरोपी को 13 मार्च, 17 मार्च और 22 मार्च को नोटिस भेजकर पूछताछ के लिए बुलाया गया था, लेकिन वह एक बार भी हाजिर नहीं हुआ। आरोपी लगातार बीमारी और दुबई में होने का बहाना बनाकर जांच में बाधा डाल रहा था। लोक अभियोजक अनिल तिवारी की दलीलों और पुलिस के सबूतों के आधार पर कोर्ट ने माना कि आरोपी ने जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया है, जिसके बाद कोर्ट ने 21 जनवरी 2026 को दिया अपना ही जमानत का आदेश रद्द कर दिया।
कोर्ट की शर्तों का मखौल उड़ाना पड़ा भारी
जमानत की बुनियादी शर्त होती है कि आरोपी कानून का सम्मान करेगा और जांच एजेंसी को पूरा सहयोग देगा। सतीश सनपाल मामले में अदालत ने पाया कि राहत मिलने के बाद आरोपी का रवैया पूरी तरह असहयोगात्मक रहा। लार्डगंज पुलिस जब भी उसे तफ्तीश के लिए बुलाती, वह कोई न कोई नया बहाना सामने रख देता। कोर्ट ने साफ किया कि कानून से बड़ा कोई नहीं है और अगर कोई व्यक्ति अदालत द्वारा तय की गई मर्यादाओं और शर्तों को तोड़ने का प्रयास करेगा, तो उसे दी गई कानूनी राहत को बरकरार रखने का कोई औचित्य नहीं रह जाता है।
दुबई प्रवास और बीमारी के बहानों की खुली पोल
पुलिस की तफ्तीश में यह बात सामने आई कि आरोपी खुद को कानून की पहुंच से दूर रखने के लिए लगातार पैंतरे बदल रहा था। जब पुलिस ने उसे लार्डगंज थाने में दर्ज अपराध संख्या के तहत तलब किया, तो उसने अपनी बीमारी के पर्चे और दुबई में होने की बात कहकर टालमटोल शुरू कर दी। लोक अभियोजक अनिल तिवारी ने अदालत के सामने दलील दी कि आरोपी का यह आचरण सिर्फ जांच को भटकाने और समय काटने की एक सोची-समझी रणनीति है। अदालत ने पुलिस के इन सभी तर्कों को सही और तार्किक पाया कि आरोपी जानबूझकर देश से बाहर बैठकर जांच से भाग रहा है।
लार्डगंज थाने में दर्ज है जालसाजी का संगीन मुकदमा
इस पूरे मामले की जड़ें लार्डगंज थाने में दर्ज उस मुकदमें से जुड़ी हैं, जिसमें सतीश सनपाल के खिलाफ धारा 420, 467 और 120 बी के तहत अपराध दर्ज किया गया है। यह धाराएं धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज तैयार करने और आपराधिक साजिश रचने जैसे गंभीर मामलों में लगाई जाती हैं। इसी मामले में गिरफ्तारी से बचने के लिए आरोपी ने पहले अग्रिम जमानत ली थी। अब कोर्ट से दोबारा झटका लगने के बाद आरोपी पर गिरफ्तारी की तलवार लटक गई है। इस फैसले से साफ है कि गंभीर अपराधों के आरोपियों को जांच में मनमानी करने की छूट नहीं दी जा सकती।
