‘एमआरपी की घर वापसी’: शराब दुकानों से लापता सरकारी दाम अब फिर लौटेंगे,ओवररेटिंग पर शिकंजा

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Newzo - News Editor
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जबलपुर में ओवररेटिंग के सिंडिकेट पर मचा हड़कंप, बदनामी के बाद जागा आबकारी महकमा, शराब दुकानों पर अवैध वसूली बनी बदनामी का सबब

जबलपुर। जिले में लंबे समय से आबकारी अधिकारियों और शराब ठेकेदारों की कथित मिलीभगत से चल रहा अवैध ओवररेटिंग का खेल अब पूरी तरह बेनकाब हो चुका है। शराब दुकानों पर तय मूल्य से काफी अधिक दामों पर शराब बेचे जाने की शिकायतें आम थीं, जिसके जरिए होने वाली अवैध वसूली सीधे जिम्मेदार जेबों में जा रही थी। इस संगठित गड़बड़ी के खिलाफ जब आम जनता का गुस्सा फूटा और बाजार के ही दूसरे धड़े ने इस सिंडिकेट के खिलाफ मोर्चा खोलकर तगड़ा हड़कंप मचाया, तब जाकर नींद में सोए प्रशासनिक महकमे में खलबली मची। जन दबाव और इस आंतरिक खींचतान के बाद जिला प्रशासन की फटकार लगते ही आबकारी विभाग ने आनन-फानन में जिले की सभी 143 शराब दुकानों में रेट लिस्ट अनिवार्य रूप से चटकाने के निर्देश जारी कर दिए हैं। शहरी क्षेत्र की 72 और ग्रामीण क्षेत्रों की 71 शराब दुकानों को नोटिस थमाकर एमआरपी से अधिक दाम वसूलने पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी तो दी गई है, लेकिन पूर्व में आशीष शिवहरे और सोम ग्रुप जैसे बड़े नामों के इर्द-गिर्द चर्चा में आए इस सिंडिकेट के रसूख को देखते हुए इन सरकारी नोटिसों की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

​तात्कालिक सक्रियता पर उठते बड़े सवाल

​क्षेत्र में लगातार मिल रही शिकायतों और डिजिटल भुगतान की पर्चियों के सबूत भोपाल तक पहुंचने के बावजूद अब तक जिम्मेदार मौन साधे हुए थे। जब दूसरे व्यावसायिक धड़े के कड़े विरोध के कारण साख पर आंच आई, तब जाकर विभाग ने अपनी नाक बचाने के लिए कागजी कार्रवाई का सहारा लिया है। शहर से लेकर देहात तक फैली सभी दुकानों पर नोटिस जारी करना केवल एक प्रशासनिक खानापूर्ति नजर आता है, क्योंकि पूर्व में भी ऐसे नियम सिर्फ कागजों तक ही सीमित रहे हैं।

​सिंडिकेट के रसूख के आगे एक्शन पर गहरा संशय

​ठेकेदारों द्वारा मनमाने दामों पर की जा रही अवैध उगाही को रोकने के लिए दीवारों पर हर ब्रांड की मूल्य सूची लगाना तय तो कर दिया गया है, पर इस व्यवस्था का पूरी तरह पालन होगा या नहीं, इसे लेकर जनता में भारी संशय है। एक करोड़ रुपये महीने के लेन-देन और लगभग 20 प्रतिशत अधिक दाम वसूलने के गंभीर दावों के बीच, क्या छोटे कर्मचारियों और ठेकेदारों पर यह आदेश सच में लागू हो पाएगा या यह खेल यूं ही जारी रहेगा, यह सबसे बड़ा संशय का विषय बना हुआ है।

​सिर्फ कागजी घोड़ों के दौड़ने से क्या होगा

​जागरूक उपभोक्ताओं ने लगातार अधिक पैसे वसूलने का विरोध किया और ऑनलाइन ट्रांजैक्शन की स्लिप निकालकर सीधे विभाग को भेजी थीं, जिससे विवाद की स्थितियां भी बनीं। इस पूरे मामले में जनता की सीधी लड़ाई और सिंडिकेट के आपसी टकराव के बाद ही यह दिखावटी बदलाव सामने आया है, जिससे साफ है कि बिना कड़े जमीनी निरीक्षण और सीधे एक्शन के इस भ्रष्टाचार पर पूरी तरह रोक लगा पाना फिलहाल नामुमकिन दिखाई दे रहा है।

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