
जबलपुर। मध्यप्रदेश की राज्यसभा की खाली सीटों के लिए चुनावी बिसात बिछ चुकी है। प्रथम दृष्टया मुकाबला साफ है कि बीजेपी 2 सीटों पर और कांग्रेस 1 सीट पर जीत दर्ज कर रही है। परंतु पर्दे के पीछे की सियासत बेहद दिलचस्प हो चुकी है। बीजेपी ने बुंदेलखंड से ओबीसी चेहरे के रूप में महेश केवट को अपना प्रत्याशी बनाकर जातिगत समीकरण साधने का अचूक दांव खेला है। इस रणनीतिक घेराबंदी के बीच कांग्रेस ने दिग्विजय सिंह का टिकट काटकर मीनाक्षी नटराजन को चुनावी मैदान में उतारा है। इस बड़े बदलाव के बाद खुद राहुल गांधी पूरे चुनाव की कमान संभालते हुए नजर रखे हुए हैं। इसके बावजूद कांग्रेस खेमे में भारी बेचैनी और घबराहट का माहौल साफ दिखाई दे रहा है। बीजेपी की नजरें अब कांग्रेस के अंदरूनी घटनाक्रम पर टिकी हैं। हालांकि पहला मौका नहीं होगा जब कांग्रेस इस तरह से जीती सीट हार रही हो इसके पहले भी कांग्रेस के बगावती सवारों ने राज्यसभा में बीजेपी को फायदा पहुंचाया है।
कांग्रेस के दिग्गज नेताओं की नाराजगी से बढ़ी मुश्किलें
विपक्षी दल के भीतर लंबे समय से चल रही गुटबाजी अब खुलकर सामने आने लगी है। टिकट वितरण के बाद से ही पार्टी के कई वरिष्ठ और प्रभावशाली नेता भीतर ही भीतर बेहद नाराज चल रहे हैं। इस अंदरूनी कलह और दिग्गजों की बेरुखी से इनकार नहीं किया जा सकता है। पार्टी नेतृत्व लगातार डैमेज कंट्रोल की कोशिश कर रहा है, लेकिन असंतोष की यह आग बुझने का नाम नहीं ले रही है। इसी खींचतान ने पूरी पार्टी को इस समय बैकफुट पर धकेल दिया है।
असंतोष का लाभ उठाने के लिए बीजेपी की खास रणनीति
सत्तानशीं दल इस पूरे आंतरिक विवाद को एक बड़े अवसर के रूप में देख रहा है। रणनीति के तहत वह इस ताक में बैठी है कि कब कांग्रेस का कोई बड़ा और कद्दावर नेता अपनी ही पार्टी से नाराज होकर बगावती रुख अपनाए। जैसे ही विपक्षी खेमे में थोड़ी भी हलचल होगी, वैसे ही बीजेपी अपना बड़ा दांव खेलने के लिए पूरी तरह तैयार बैठी है। अगर विपक्ष का असंतोष वोटिंग के दौरान फूटता है, तो इसका सीधा फायदा दूसरी तरफ पहुंचेगा।
आखिरी समय के फैसलों पर टिकी नजर
हालांकि अंकगणित के हिसाब से बीजेपी की 2 सीटें पूरी तरह पक्की मानी जा रही हैं। इसके बाद भी उसकी नजरें तीसरी सीट को अपनी झोली में डालने पर टिकी हैं। फिलहाल सबकी निगाहें नाराज चल रहे विपक्षी दिग्गजों के अंतिम फैसले पर टिकी हैं कि वे मतदान के दिन क्या रुख अपनाते हैं। यदि वे अंतिम समय पर पार्टी लाइन से अलग जाते हैं, तो मुकाबला त्रिकोणीय और बेहद अप्रत्याशित हो सकता है।
