
भोपाल। मध्य प्रदेश में पदोन्नति में आरक्षण के नए नियमों को लेकर फिर से विवाद की स्थिति पैदा हो गई है। राज्य सरकार वर्ष 2025 के प्रस्तावित नियमों के आधार पर पदोन्नति प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी में है, जिसका सामान्य वर्ग के कर्मचारियों ने कड़ा विरोध शुरू कर दिया है। सामान्य, पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग अधिकारी कर्मचारी संस्था यानी सपाक्स ने इन नियमों को विसंगतिपूर्ण बताते हुए प्रदेशव्यापी आंदोलन का ऐलान कर दिया है। मुख्य विवाद आरक्षित वर्ग को अनारक्षित पदों पर भी मेरिट के आधार पर मौका देने को लेकर है, जबकि कर्मचारी संगठनों की मांग है कि पदोन्नति का लाभ अपनी-अपनी श्रेणी में ही मिलना चाहिए। वर्ष 2016 में हाई कोर्ट द्वारा पदोन्नति नियमों को निरस्त किए जाने के बाद से ही यह मामला उलझा हुआ है और अब नए नियमों के कारण कर्मचारी संगठनों के बीच फिर से टकराव बढ़ गया है।
पदोन्नति नियमों में विसंगतियों से बढ़ रहा आक्रोश
सपाक्स की केंद्रीय कार्यकारिणी की हाल ही में भोपाल में हुई बैठक में नए नियमों पर नाराजगी जताई गई है। संस्था का मानना है कि आरक्षित वर्ग को आरक्षित पदों के साथ ही अनारक्षित पदों पर भी मेरिट के आधार पर अवसर देने का प्रावधान गलत है। इस व्यवस्था से अनारक्षित श्रेणी के कर्मचारियों को नुकसान होगा। हालांकि, सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि यदि आरक्षित वर्ग का कोई व्यक्ति अनारक्षित श्रेणी में पदोन्नत होता है, तो वह अपनी मूल श्रेणी में नहीं लौट पाएगा और आरक्षित कोटे का एक पद कम हो जाएगा। इसके बावजूद, सामान्य वर्ग का तर्क है कि इससे उन्हें कोई वास्तविक लाभ नहीं मिलेगा क्योंकि पूर्व में पदोन्नत हो चुके आरक्षित वर्ग के कर्मचारी वरिष्ठता में उनसे पहले ही आगे हैं।
अजाक्स और सरकार के दावों का विश्लेषण
अनुसूचित जाति-जनजाति के अधिकारी-कर्मचारी संगठन यानी अजाक्स का पक्ष है कि उन्हें 36 प्रतिशत आरक्षण का लाभ तो मिलना ही चाहिए, साथ ही अनारक्षित पदों पर भी मेरिट के आधार पर उनकी दावेदारी बनी रहनी चाहिए। अजाक्स चाहता है कि पहले अनारक्षित पदों को भरा जाए और उसके बाद आरक्षित वर्ग की पदोन्नति हो। इस मांग को सरकार ने नए नियमों में समाहित किया है। सरकार का दावा है कि नियमों में संतुलन बनाने की कोशिश की गई है, लेकिन सपाक्स का आरोप है कि सरकार ने पूर्व की गलतियों को दोहराया है। लंबे समय से चल रहे इस विवाद के कारण हजारों कर्मचारियों की पदोन्नति अटकी हुई है और इस नए नियम से भविष्य में सेवानिवृत्त होने वाले सामान्य वर्ग के कर्मचारियों के हक पर संकट मंडरा रहा है।
भविष्य की राह और आंदोलन की रणनीति
प्रदेश में पदोन्नति के नियमों को लेकर पैदा हुई यह खींचतान आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है। सपाक्स ने इसे लेकर प्रदेशव्यापी आंदोलन की जो रणनीति बनाई है, उससे प्रशासनिक कामकाज प्रभावित होने की संभावना है। कर्मचारी वर्ग के बीच इस बात को लेकर निराशा है कि हाई कोर्ट के निर्देश के बाद भी सरकार स्पष्ट और विवादमुक्त नीति नहीं बना पाई है। यदि सरकार इन नियमों में संशोधन नहीं करती है, तो मामला फिर से कानूनी लड़ाई में उलझ सकता है। फिलहाल, सभी की नजरें सरकार के अगले कदम और कर्मचारी संगठनों के आंदोलन के स्वरूप पर टिकी हैं। प्रशासन के सामने यह बड़ी चुनौती है कि वह सभी वर्गों को संतुष्ट करते हुए पदोन्नति की प्रक्रिया को कैसे आगे बढ़ाता है।
