
जबलपुर। जिले के बेलखेड़ा थाना क्षेत्र स्थित सुन्दरादेही गांव से 4 मई 2013 को गोविंद प्रसाद चौधरी अचानक लापता हो गए थे। मामले की गंभीरता को देखते हुए उनकी पत्नी विनिता ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। विनिता का आरोप था कि गांव के ही सोनू चौधरी, महेश चौधरी और अंजू चौधरी से उनके पति की पुरानी रंजिश थी और उन लोगों ने गोविंद के साथ मारपीट भी की थी। मारपीट के बाद गोविंद को इलाज के लिए शाहपुर स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया था, जिसके बाद से वे रहस्यमय तरीके से गायब हैं। इस मामले में पुलिस 13 साल बीत जाने के बाद भी कोई ठोस सुराग नहीं जुटा पाई है। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मामले का निराकरण करते हुए पुलिस को जांच जारी रखने के निर्देश दिए हैं।
कोर्ट ने कहा अब तक आना होता तो अब तक आ चुके होते
याचिका पर सुनवाई करते हुए कार्यवाहक चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने पुलिस द्वारा पेश की गई स्टेटस रिपोर्ट का अवलोकन किया। कोर्ट ने पाया कि घटना को 13 साल से अधिक का लंबा समय बीत चुका है और लापता व्यक्ति एक बालिग नागरिक है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि गोविंद का घर लौटने का इरादा होता, तो वे अब तक वापस आ चुके होते। इसके बावजूद अदालत ने पुलिस को निर्देशित किया कि गुमशुदगी की जांच और व्यक्ति की तलाश निरंतर जारी रखी जाए। साथ ही कोर्ट ने आदेश दिया कि जैसे ही लापता व्यक्ति का पता चले, उन्हें तुरंत उनकी पत्नी विनिता के सुपुर्द किया जाए।
रंजिश के चलते परिवार ने जताई थी शंका
गोविंद की पत्नी विनिता ने अपनी शिकायत में गांव के तीन लोगों सोनू, महेश और अंजू चौधरी पर गंभीर आरोप लगाए थे। विनिता के अनुसार, आरोपियों ने पहले लोहे की राड से उनके पति के साथ बेरहमी से मारपीट की थी। इस घटना के बाद बेलखेड़ा पुलिस की मौजूदगी में उन्हें स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया था। मेडिकल जांच पूरी होने के बाद, गोविंद की सहमति से उनके पिता घर लौट आए थे, लेकिन उसके बाद गोविंद का कहीं पता नहीं चला। विनिता ने इस दौरान पुलिस के आला अधिकारियों को भी आवेदन दिए थे, लेकिन पुलिस की निष्क्रियता के कारण उन्हें न्याय की उम्मीद में उच्च न्यायालय की शरण लेनी पड़ी।
परिवार वाले नहीं दे सके कोई सुराग
लंबी कानूनी लड़ाई और पुलिस की अब तक की विफलताओं को देखते हुए हाईकोर्ट ने मामले के हर पहलू पर गौर किया। हालांकि अदालत ने माना कि इतने वर्षों बाद व्यक्ति के स्वैच्छिक रूप से लौटने की संभावना कम है, फिर भी पुलिस तंत्र को जांच बंद करने की अनुमति नहीं दी गई। कोर्ट ने याचिकाकर्ता पत्नी से भी जानकारी मांगी, जिस पर वे कोई नया सुराग देने में असमर्थ रहीं। अब पूरा दारोमदार पुलिस की कार्यप्रणाली पर है कि वे इतने वर्षों बाद भी इस रहस्य से पर्दा उठा पाते हैं या नहीं। फिलहाल यह मामला लापता व्यक्ति की बरामदगी के इंतजार में एक अनसुलझी पहेली बना हुआ है।
