जबलपुर में SP के आदेश पर भारी पड़ा SI का रसूख, 5 महीने बाद भी तिलवारा थाना छोड़ने को तैयार नहीं अभिषेक कैथवास!

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Newzo - News Editor 45 Views
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जबलपुर। मध्य प्रदेश पुलिस महकमे में अनुशासन और वरिष्ठ अधिकारियों के आदेश सर्वोपरि माने जाते हैं, लेकिन संस्कारधानी (जबलपुर) में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने पुलिसिंग व्यवस्था की साख पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहाँ पुलिस महानिदेशक (DGP) कैलाश मकवाणा के साफ निर्देशों और पुलिस अधीक्षक (SP) के लिखित आदेश की सरेआम अवहेलना की जा रही है। तिलवारा थाने में पदस्थ उपनिरीक्षक (SI) अभिषेक कैथवास का तबादला हुए 5 महीने से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन वे आज तक नए थाने के लिए रिलीव नहीं हुए हैं। चर्चा है कि थाने की ‘मलाईदार कुर्सी’ का मोह और पर्दे के पीछे काम कर रहा तगड़ा रसूख इस मनमर्जी की मुख्य वजह है।

5 जनवरी को जारी हुआ था आदेश, बाकी सबने ज्वाइन किया

पूरा मामला पुलिसिंग व्यवस्था को पारदर्शी और सुदृढ़ बनाने की कवायद से जुड़ा है। जबलपुर पुलिस अधीक्षक संपत उपाध्याय ने 5 जनवरी 2026 को जिले की कानून व्यवस्था में कसावट लाने के उद्देश्य से 5 उपनिरीक्षकों (SIs) के तबादला आदेश जारी किए थे।इस सूची में तिलवारा थाने में जमे उपनिरीक्षक अभिषेक कैथवास का नाम भी शामिल था, जिन्हें संजीवनी नगर थाना स्थानांतरित किया गया था।हैरानी की बात यह है कि इस आदेश के बाद सूची में शामिल अन्य सभी 4 उपनिरीक्षकों ने तत्काल अपने नए थानों में आमद (जॉइनिंग) दे दी और कामकाज संभाल लिया।लेकिन, उपनिरीक्षक अभिषेक कैथवास 5 महीने बाद भी तिलवारा थाने की कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं हैं।

थाने तक पहुंचने ही नहीं दिया गया ट्रांसफर ऑर्डर!

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाला और गंभीर पहलू यह है कि उपनिरीक्षक का तबादला आदेश आधिकारिक तौर पर तिलवारा थाने के रिकॉर्ड तक पहुँचने ही नहीं दिया गया। विभागीय सूत्रों की मानें तो रसूख और सांठगांठ के चलते फाइल को इस तरह दबाया गया कि कागजों पर ट्रांसफर होने के बावजूद जमीनी स्तर पर उपनिरीक्षक महोदय उसी थाने में जमे रहे और वरिष्ठ अधिकारियों को भनक तक नहीं लगने दी गई।

DGP कैलाश मकवाणा के आदेशों की खुली अवहेलना

कुछ महीने पहले ही पुलिस महानिदेशक (DGP) कैलाश मकवाणा ने प्रदेश के सभी पुलिस अधीक्षकों को एक कड़ा पत्र जारी किया था। इस पत्र में स्पष्ट निर्देश थे कि:थानों में लंबे समय से पदस्थ पुलिसकर्मियों के तबादले कर व्यवस्था में कसावट लाई जाए।स्थानांतरण आदेशों का पालन पूरी गंभीरता और बिना किसी पक्षपात के समय-सीमा के भीतर होना चाहिए।लेकिन जबलपुर के तिलवारा थाने में चल रहे इस खेल ने डीजीपी के ‘जीरो टॉलरेंस और अनुशासन’ के दावों की हवा निकाल कर रख दी है।

चर्चाओं का बाजार गर्म: ‘मलाईदार कुर्सी’ का खेल या राजनीतिक रसूख?

पुलिस महकमे के गलियारों से लेकर आम जनता के बीच अब यह मामला तेजी से गरमा रहा है। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर एक अदने से उपनिरीक्षक में इतना दम कहाँ से आया कि वह एसपी और डीजीपी दोनों के आदेशों को ठेंगा दिखा दे?

कमीशन और मलाई का मोह

थानों में कुछ खास ‘कुर्सियां’ और प्रभार ऐसे होते हैं जहाँ अवैध गतिविधियों पर संरक्षण देने और अन्य तरीकों से मोटी कमाई (मलाई) होती है। सूत्रों का कहना है कि इसी ‘मलाई’ के चक्कर में साहब तिलवारा छोड़ने को तैयार नहीं हैं।

संजीवनी नगर जाने से परहेज

संजीवनी नगर जैसे चुनौती भरे थाने में जाकर काम करने के बजाय तिलवारा की सुरक्षित और आरामदायक जगह में रहना ही उपनिरीक्षक की पहली पसंद बना हुआ है।जब रक्षक ही नियम-कानूनों और अपने मुखिया के आदेशों का मखौल उड़ाने लगें, तो आम जनता से अनुशासन की उम्मीद कैसे की जा सकती है? 5 महीने से चल रहे इस खुले उल्लंघन पर पुलिस कप्तान (SP) संपत उपाध्याय की नजर क्यों नहीं पड़ी? क्या इस मामले में तिलवारा थाना प्रभारी और लाइन अटैचमेंट देखने वाले बाबुओं की भी मिलीभगत है? इस रसूखदार उपनिरीक्षक पर अनुशासनात्मक कार्रवाई कब होगी?

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