
जबलपुर। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के एकात्म भवन में आयोजित कार्य परिषद की आपातकालीन बैठक भारी हंगामे और विरोध के बीच समाप्त हो गई। कुलपति प्रो. राजेश वर्मा की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में उस समय स्थिति अनियंत्रित हो गई जब एजेंडे की गोपनीयता और उसमें शामिल विषयों को लेकर सदस्यों ने कड़ा ऐतराज जताया। विश्वविद्यालय के इतिहास में यह पहली बार हुआ कि एजेंडे की कॉपी बैठक के दौरान ही फाड़ दी गई, जिससे प्रशासनिक कामकाज पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। बैठक में 13 कर्मचारियों को नियमित करने और परीक्षा परिणाम तैयार करने वाली कंपनी के टेंडर जैसे संवेदनशील मुद्दे शामिल थे। इस दौरान कुलपति और कुलसचिव के बीच मतभेद खुलकर सामने आए और कार्य परिषद के सदस्यों ने कुलपति के प्रस्तावों का पुरजोर विरोध किया, जिससे विश्वविद्यालय परिसर में दिन भर चर्चाओं का बाजार गर्म रहा।
नियमों को ताक पर रखकर लिए जा रहे निर्णय
बैठक में सबसे बड़ा विवाद 13 कर्मचारियों को नियमित करने के मामले पर हुआ। कुलपति प्रो. राजेश वर्मा इस मामले में गठित समिति के आदेश में संशोधन करना चाहते थे। कार्य परिषद के सदस्यों ने इसे प्रशासनिक नियमों के विरुद्ध बताया और कहा कि कुलपति और कुलसचिव आपसी सहमति से कोई भी निर्णय लेने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं। सदस्यों ने जोर देकर कहा कि 30 मार्च को हुई पिछली बैठक में जो निर्णय लिए गए थे, उन्हें ही प्रभावी रखा जाए। इस विवाद में कार्य परिषद के सदस्य कुलसचिव के पक्ष में खड़े दिखाई दिए, जिससे कुलपति की स्थिति काफी असहज हो गई और पूरी प्रशासनिक व्यवस्था सवालों के घेरे में आ गई।
टेंडर प्रक्रिया में घपले की उठ रही आवाज
दूसरा बड़ा विवाद परीक्षा परिणाम जारी करने वाली कंपनी के टेंडर को लेकर हुआ। वर्ष 2025 में टेंडर प्रक्रिया के दौरान दिल्ली की एक कंपनी ने सबसे कम रेट दिए थे, लेकिन उसे आज तक कार्य आदेश नहीं मिला है। कुलपति का प्रस्ताव था कि पुरानी कंपनी से ही परिणाम और मार्कशीट तैयार करवाई जाए। सदस्यों ने इस प्रस्ताव को खारिज करते हुए तर्क दिया कि पुरानी और नई कंपनी के रेट में बड़ा अंतर है। सदस्यों ने साफ कहा कि पुरानी कंपनी को काम देने से भविष्य में ऑडिट के दौरान आपत्तियां लग सकती हैं। इस मुद्दे पर भी सहमति न बन पाने के कारण बैठक में भारी शोर-शराबा हुआ और अंततः एजेंडे की कॉपी फाड़ दी गई।
प्रशासनिक गतिरोध से कामकाज पर लग गया विराम
दोनों ही प्रमुख मुद्दों पर आम सहमति न बन पाने के कारण बैठक बिना किसी ठोस परिणाम के खत्म हो गई। कुलपति और परिषद सदस्यों के बीच बना यह गतिरोध विश्वविद्यालय के शैक्षणिक और प्रशासनिक कामकाज पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। फिलहाल स्थिति यह है कि न तो कर्मचारियों के नियमितीकरण पर फैसला हो पाया है और न ही परीक्षा परिणामों के लिए नई कंपनी का चयन सुनिश्चित हो सका है। विश्वविद्यालय प्रशासन की इस कार्यप्रणाली ने छात्रों और कर्मचारियों के मन में भविष्य को लेकर कई शंकाएं पैदा कर दी हैं। यदि जल्द ही इस विवाद का निपटारा नहीं हुआ तो आने वाले दिनों में और अधिक प्रशासनिक अड़चनें सामने आ सकती हैं।
