कटघरे में खाकी:मेडिकल क्लेम घोटाले के आरोपियों को कैसे मिल गया तरक्की का तोहफा

Newzo
Newzo - News Editor 81 Views
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जबलपुर। मध्य प्रदेश पुलिस मुख्यालय की हालिया पदोन्नति प्रक्रिया गंभीर अनियमितताओं और प्रशासनिक लापरवाही के चलते बड़े विवाद के घेरे में आ गई है। पुलिस मुख्यालय ने 9 जुलाई, 2026 को 194 सहायक उप निरीक्षकों को उप निरीक्षक पद पर पदोन्नत करने के आदेश जारी किए थे, जिससे महकमे में हड़कंप मच गया है। इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि इससे ठीक पहले 8 मई, 2026 को पुलिस मुख्यालय के वित्त विभाग ने वर्ष 2018-19 से 2024-25 के बीच चिकित्सा प्रतिपूर्ति मद में हुई भारी वित्तीय अनियमितताओं की जांच के बाद 48 पुलिसकर्मियों की एक सूची जारी की थी। जांच में खुलासा हुआ था कि इन कर्मचारियों ने फर्जी प्रोलांग मेडिकल सर्टिफिकेट प्रस्तुत करके लाखों रुपये की शासकीय राशि अवैध रूप से प्राप्त की थी। हैरानी की बात यह है कि जिन कर्मचारियों से इस वित्तीय अनियमितता के तहत राशि की वसूली की जा चुकी है या जिनके वेतन से अब भी मासिक किस्तों में रिकवरी जारी है, उन्हें भी नियमों को ताक पर रखकर उप निरीक्षक पद पर पदोन्नति दे दी गई। विभागीय नियमों के मुताबिक यदि कोई कर्मचारी शासन को आर्थिक क्षति पहुंचाने का दोषी पाया जाता है और उससे सरकारी राशि की रिकवरी की जा रही हो, तो वह कम से कम एक वर्ष तक पदोन्नति सहित किसी भी अन्य विभागीय लाभ का पात्र नहीं होता है। इसके बावजूद पदोन्नति सूची में ऐसे नाम शामिल होना विभागीय पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस के दावों की पोल खोलता है। जिन कर्मचारियों ने पदोन्नति से बचने के लिए एकमुश्त राशि जमा कराई उनमें के. मिंज, आशीष अग्निहोत्री, पूनम बघेल, मंशाराम बघेल, प्रताप सिंह बामनिया, अंजु पंद्राम, कृष्णपाल सिंह, आरती चतुर्वेदी, अंतिमा जैन, अर्पणा द्विवेदी, विपिन कुमार रौतेल, गौरव आरोणकर, संदीप सूर्यवंशी और स्नेहिल सिंह बैस शामिल हैं। इसके अलावा लीलाधर तिवारी से करीब 4.98 लाख रुपये और राकेश त्रिपाठी से 5.34 लाख रुपये की रिकवरी अभी भी मासिक किस्तों में जारी है, फिर भी उन्हें पदोन्नत कर दिया गया, जबकि तीन अन्य कर्मचारियों पर धोखाधड़ी के आपराधिक मामले भी दर्ज रहे हैं।

​फर्जी प्रोलांग मेडिकल सर्टिफिकेट का खेल

मध्य प्रदेश पुलिस मुख्यालय के द्वारा हाल ही में जारी की गई 194 सहायक उप निरीक्षकों की पदोन्नति सूची ने विभागीय कामकाज और आंतरिक शुचिता पर गहरे प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। यह पूरा मामला तब उजागर हुआ जब यह बात सामने आई कि जिन पुलिसकर्मियों ने फर्जी प्रोलांग मेडिकल सर्टिफिकेट का इस्तेमाल करके चिकित्सा प्रतिपूर्ति के नाम पर शासन को आर्थिक चूना लगाया था, उन्हीं दागियों को पदोन्नत कर दिया गया। पुलिस मुख्यालय के वित्त विभाग ने 8 मई, 2026 को वर्ष 2018-19 से 2024-25 के बीच हुई वित्तीय अनियमितताओं की जांच के बाद 48 ऐसे कर्मचारियों की सूची उजागर की थी जिन्होंने फर्जी दस्तावेजों के सहारे लाखों रुपये डकारे थे। जांच के दायरे में आने वाले कई पुलिसकर्मियों ने पदोन्नति की आहट मिलते ही अपनी गर्दन बचाने के लिए एकमुश्त राशि वापस जमा करा दी, जिससे उनकी नीयत पर सवाल खड़े होते हैं। इस सूची में के. मिंज, आशीष अग्निहोत्री, पूनम बघेल, मंशाराम बघेल, प्रताप सिंह बामनिया, अंजु पंद्राम, कृष्णपाल सिंह, आरती चतुर्वेदी, अंतिमा जैन, अर्पणा द्विवेदी, विपिन कुमार रौतेल, गौरव आरोणकर, संदीप सूर्यवंशी और स्नेहिल सिंह बैस जैसे नाम प्रमुखता से शामिल हैं। इन सभी से भारी-भरकम राशि की वसूली की गई थी, लेकिन इसके बावजूद इन्हें प्रशासनिक मेहरबानी का पूरा लाभ मिला और इनके नामों को पदोन्नति सूची में धड़ल्ले से शामिल कर लिया गया।

​वेतन से रिकवरी जारी फिर भी मिला प्रमोशन

​विभाग के अंदर चल रहे इस खेल का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि कुछ ऐसे पुलिसकर्मी भी पदोन्नत होने में सफल रहे जिनके वेतन से सरकारी राशि की रिकवरी अभी भी मासिक किस्तों के रूप में काटी जा रही है। मौजूदा विभागीय नियमों का स्पष्ट प्रावधान यह कहता है कि यदि कोई भी कर्मचारी शासन को आर्थिक क्षति पहुंचाने का दोषी पाया जाता है और उससे शासकीय राशि की वसूली की प्रक्रिया चल रही है, तो वह कम से कम एक वर्ष की अवधि तक पदोन्नति या किसी भी प्रकार के अन्य विभागीय लाभ के योग्य नहीं माना जाएगा। इसके बावजूद लीलाधर तिवारी से करीब 4.98 लाख रुपये और राकेश त्रिपाठी से 5.34 लाख रुपये की भारी राशि की वसूली मासिक किस्तों के जरिए लगातार जारी रहने के बाद भी उनके नाम पदोन्नति सूची में कैसे और किसके इशारे पर शामिल किए गए, यह बड़ा रहस्य बना हुआ है। इतना ही नहीं, इस विवादित पदोन्नति सूची में तीन ऐसे कर्मचारियों के नाम भी शामिल होने की पुख्ता खबरें हैं जिन पर पहले से ही धोखाधड़ी जैसे गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इन तमाम दस्तावेजों और नियमों की खुली अनदेखी ने इस बात को पुख्ता कर दिया है कि महकमे के भीतर कुछ खास लोगों को बचाने के लिए नियमों को किस हद तक मोड़ा और तोड़ा गया है।

​रुपये जमा कराकर फाइलों को दबाने का षडयंत्र

​शुरुआती जांच के मोर्चे पर पुलिस मुख्यालय के वित्त विभाग की भूमिका भी अब सीधे तौर पर संदेह के घेरे में आ गई है। आरोप है कि वित्त विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों ने रिकवरी के दायरे में आने वाले कर्मचारियों के मामलों में आगे की सख्त विभागीय जांच और अनुशासनात्मक कार्रवाई को आगे बढ़ाने के बजाय केवल उनसे एकमुश्त राशि जमा कराकर पूरे मामले को ठंडे बस्ते में डालने का काम किया। पर्दे के पीछे यह सुनियोजित खेल खेला गया ताकि इन कर्मचारियों के खिलाफ कोई बड़ी कानूनी कार्रवाई न हो सके और समय आने पर इन्हें आसानी से पदोन्नति का लाभ थमाया जा सके। पदोन्नति प्रक्रिया को पूरी तरह अमलीजामा पहनाने के दौरान रिकवरी और आपराधिक मामलों से जुड़े बेहद महत्वपूर्ण तथ्यों की पुख्ता जानकारी सक्षम और जिम्मेदार उच्च अधिकारियों तक पूरी तरह छिपाई गई या उन्हें अंधेरे में रखा गया। इसी सोची-समझी रणनीति के तहत नियमों के बिल्कुल विपरीत जाकर यह पूरी पदोन्नति प्रक्रिया संपन्न कराई गई, जिससे पुलिस महकमे की छवि को तगड़ा झटका लगा है और आमजन के बीच भी इसकी निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

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