

जबलपुर। सिहोरा क्षेत्र में अगरिया टिकरिया गांव के आदिवासी परिवारों के ऊपर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। वन विभाग ने इन परिवारों को चेतावनी दी है कि वे अपनी खेती वाली भूमि तत्काल खाली कर दें। अपनी आजीविका बचाने के लिए लटकन कोल, लक्ष्मण, रामविशाल, बिहारी और सुखलाल कोल सहित अन्य ग्रामीणों ने कांग्रेस नेता अमोल चौरसिया के नेतृत्व में मंगलवार को सिहोरा एसडीएम कार्यालय पहुंचकर गुहार लगाई है। करीब 15 साल से वन विभाग की परती जमीन को मेहनत से उपजाऊ बनाकर अपना पेट पाल रहे इन आदिवासियों को अब बेदखली का डर सता रहा है। अधिकारियों द्वारा लगातार दी जा रही धमकियों से परेशान ग्रामीणों ने प्रशासन से न्याय की मांग की है ताकि उन्हें भूमिहीन होकर दर-दर न भटकना पड़े।
पीढ़ियों का बसेरा बचाने के लिए लड़ी लड़ाई
इन आदिवासी परिवारों का कहना है कि वे कई पीढ़ियों से भूमिहीन हैं और उनके पास आजीविका का कोई अन्य साधन नहीं है। करीब 15 साल पहले उन्होंने जंगल की खाली पड़ी बंजर भूमि को समतल कर खेती के योग्य बनाया था। इसी भूमि पर निर्भर होकर वे अपने बच्चों का भरण-पोषण कर रहे थे। अब अचानक वन विभाग के अधिकारियों द्वारा जमीन खाली करने का दबाव बनाने से परिवार पूरी तरह दहशत में हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि विभाग के कर्मचारी लगातार उन्हें डरा-धमका रहे हैं, जिससे उनकी रोजमर्रा की जिंदगी और खेती का काम बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
प्रशासन से न्याय की उम्मीद में जुटे ग्रामीण
मंगलवार को सिहोरा एसडीएम को सौंपे गए ज्ञापन में आदिवासियों ने स्पष्ट किया कि उन्हें जंगल की इस जमीन पर ही खेती करने की अनुमति दी जाए। अमोल चौरसिया ने प्रशासन को बताया कि ये लोग बरसों से इसी जमीन के सहारे अपना जीवन यापन कर रहे हैं और इन्हें उजाड़ना इनके भविष्य को खत्म करने जैसा है। आदिवासियों का तर्क है कि जब उन्होंने मेहनत करके अनुपयोगी भूमि को उपजाऊ बनाया है, तो उन्हें बेदखल करने के बजाय सरकार को उनके अधिकारों का संरक्षण करना चाहिए। प्रशासन से गुहार लगाने आए ग्रामीणों ने उम्मीद जताई है कि उनकी पीड़ा को समझते हुए उन्हें बेदखली से राहत दी जाएगी।
आजीविका छिनने के डर से सहमे पीड़ित परिवार
जमीन के मालिकाना हक या खेती करने के अधिकार को लेकर छिड़े इस विवाद ने अब बड़ा रूप ले लिया है। अगरिया टिकरिया के ग्रामीणों की मांग है कि उन्हें विस्थापित करने के बजाय पुनर्वास या खेती की अनुमति दी जाए। एसडीएम को दिए गए आवेदन में साफ लिखा है कि यदि उन्हें जमीन से बेदखल किया गया, तो उनके सामने भुखमरी की स्थिति पैदा हो जाएगी। वन विभाग और ग्रामीणों के बीच इस विवाद को सुलझाने के लिए अब सबकी निगाहें प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं। स्थानीय लोग चाहते हैं कि मानवीय आधार पर उनकी समस्या का त्वरित निराकरण हो ताकि वे शांतिपूर्वक अपना जीवन जी सकें।
