क्या जेडीए में बड़े घोटाले की तैयारी कर रहे सीईओ !

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Newzo - News Editor 62 Views
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तबादले के सात दिन बाद भी कुर्सी पर डटे,बैकडेट में निपटाई जा रहीं मलाईदार फाइलें,पॉलिटिलकल सपोर्ट के कारण जारी है गोरखधंधा

जबलपुर। जबलपुर विकास प्राधिकरण के सीईओ दीपक वैद्य का 1 हफ्ते पहले भोपाल ट्रांसफर हो गया है। सरकार के आदेश के बावजूद वे न तो जबलपुर से रिलीव हुए हैं और न ही भोपाल में उन्होंने कार्यभार संभाला है। कार्यालय के गलियारों में चर्चा है कि उन्हें राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है जिसके कारण भोपाल से कोई दबाव नहीं बनाया जा रहा है। इसी बीच खबर है कि सीईओ अपने पिछले 7 दिनों के कार्यकाल में लगातार बैकडेट में कई महत्वपूर्ण और मलाईदार फाइलें निपटा रहे हैं। इस स्थिति ने भ्रष्टाचार की गंभीर आशंकाओं को जन्म दिया है और स्थानीय स्तर पर जनता के हितों के साथ खिलवाड़ माना जा रहा है। प्रशासनिक नियमों को ताक पर रखकर हो रहे इस काम की निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है क्योंकि फैक्स से मिले आदेश का पालन तुरंत होना अनिवार्य था।

​तबादले के बाद भी कुर्सी पर जमे सीईओ

​ट्रांसफर आदेश आने के बाद से ही सीईओ की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में आ गई है। नियमों के अनुसार, जैसे ही तबादले का फैक्स या पत्र प्राप्त होता है, अधिकारी को तुरंत कार्यभार से मुक्त होकर नए स्थान पर रिपोर्ट करना होता है। लेकिन यहाँ स्थिति पूरी तरह विपरीत है। दीपक वैद्य न केवल पद पर बने हुए हैं, बल्कि उन फाइलों पर हस्ताक्षर किए जा रहे हैं जो लंबे समय से लंबित थीं। जानकारों का कहना है कि इन 7 दिनों में जिन फाइलों को मंजूरी दी गई है, वे आर्थिक रूप से बहुत प्रभावशाली हैं। इसकी पूरी प्रक्रिया संदिग्ध नजर आ रही है क्योंकि बैकडेट में फाइलें निपटाने का सीधा अर्थ नियमों का उल्लंघन और वित्तीय गड़बड़ी हो सकता है।

​राजनीतिक रसूख के कारण जांच से बच रहे

​जेडीए के भीतर चल रही इस अनैतिक कार्यप्रणाली के खिलाफ कर्मचारियों में भी आक्रोश है। दबी जुबान में चर्चा है कि बैकडेट में फाइलें पास करने का यह काम किसी बड़े खेल की पटकथा का हिस्सा है। राजनीतिक रसूख के चलते न तो प्रशासन उन्हें रिलीव कर रहा है और न ही भोपाल से उन्हें जल्द ज्वाइन करने का कोई फरमान मिल रहा है। इस ढुलमुल रवैये ने आम लोगों के भरोसे को तोड़ दिया है। यदि इन 7 दिनों में पारित की गई फाइलों की उच्च स्तरीय जांच की जाए, तो एक बड़ा घोटाला सामने आ सकता है। प्रशासन की यह निष्क्रियता सीधे तौर पर जनहित और सरकारी धन के दुरुपयोग को बढ़ावा दे रही है।

​फाइलों की निष्पक्ष जांच की उठ रही मांग

​इस पूरे प्रकरण में जवाबदेही तय करने का समय आ गया है। जनता की गाढ़ी कमाई से चलने वाले विकास प्राधिकरण में अगर तबादले के बाद भी अधिकारी मनमर्जी चला रहे हैं, तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक अराजकता है। फैक्स से आए आदेश को 7 दिन बीत जाने के बाद भी उसे दबाकर रखना और फाइलों को निपटाना गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। अब जरूरत इस बात की है कि संबंधित अधिकारी को तत्काल प्रभाव से रिलीव किया जाए और उनके पिछले 7 दिनों के फैसलों की एक स्वतंत्र समिति द्वारा जांच की जाए। ताकि यह स्पष्ट हो सके कि बैकडेट में किन लोगों को फायदा पहुँचाने की कोशिश की गई है।

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