
शशिकांत ओझा, मुख्य जनसंपर्क अधिकारी, मप्र पावर ट्रांसमिशन कंपनी,ट्रांसको
यह भावनाओं से अधिक चिंतन का विषय है।
हम अपनी उपलब्धियों का जश्न मना रहे हैं। हम विकसित भारत की बात कर रहे हैं। हमारे शहरों में चौड़ी सड़कें बन रही हैं, बहुमंजिला इमारतें खड़ी हो रही हैं, आधुनिक बाजार सज रहे हैं, डिजिटल सुविधाएँ बढ़ रही हैं और तकनीक हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। लेकिन इन सबके बीच एक प्रश्न बार-बार मन में उठता है—क्या हमने नागरिक जिम्मेदारी और सामाजिक अनुशासन, अर्थात Civic Sense को कहीं पीछे छोड़ दिया है? यदि किसी समाज की वास्तविक तस्वीर देखनी हो तो उसके भवनों, वाहनों और बाजारों से अधिक उसके नागरिकों के व्यवहार को देखना चाहिए। क्योंकि सभ्यता का स्तर केवल आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन के प्रति लोगों की जिम्मेदारी से मापा जाता है।
आज भी हमारे शहरों और मोहल्लों में अनेक घरों का गंदा पानी सीधे सड़क पर बहता दिखाई देता है। पानी की मात्रा भले कम हो, लेकिन उससे गुजरने वाले लोगों के कपड़े और चप्पलें गंदी होती हैं, सड़क की सुंदरता प्रभावित होती है और स्वच्छता का संदेश कमजोर पड़ता है। आश्चर्य की बात यह है कि यह दृश्य अधिकांश लोगों के लिए सामान्य बन चुका है।
इसी प्रकार कुछ लोग ऊँची इमारतों से नीचे परिसर में कचरा फेंक देते हैं। वे शायद यह भूल जाते हैं कि नीचे भी इंसान रहते हैं, बच्चे खेलते हैं और वही स्थान सभी की साझा संपत्ति है। कुछ लोग पशु प्रेम के नाम पर सड़कों और सार्वजनिक स्थलों पर भोजन डाल देते हैं, सडको पर या किसी के घर के सामने गंदगी करवा देते हैं लेकिन उसके बाद उत्पन्न होने वाली विपरीत स्थिति , दुर्गंध और यातायात संबंधी समस्याओं की चिंता नहीं करते।
चलती हुई गाड़ी से पॉलिथीन, पानी की बोतल, गुटखे का रैपर या अन्य कचरा सड़क पर फेंक देना आज भी सामान्य व्यवहार माना जाता है। क्या कभी हमने सोचा है कि जिस सड़क को हम गंदा कर रहे हैं, उसी पर कल हमें या हमारे बच्चों को चलना है?
यातायात के क्षेत्र में भी स्थिति बहुत अलग नहीं है। लोग अपनी सुविधा के अनुसार कहीं भी वाहन खड़ा कर देते हैं। कई बार वे यह सोचने की आवश्यकता भी नहीं समझते कि जिस वाहन के सामने उन्होंने अपनी गाड़ी खड़ी की है, उसके मालिक को भी कहीं जाना होगा। बाजारों में अक्सर लोग दोपहिया वाहन आधी सड़क पर खड़े कर खरीदारी में व्यस्त हो जाते हैं। पीछे लंबा जाम लग जाता है, लोग हॉर्न बजाते रहते हैं, लेकिन उस व्यक्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
सार्वजनिक स्थानों पर शोर भी एक गंभीर समस्या बन चुका है। ट्रेन के डिब्बे में रात के समय जब अधिकांश यात्री विश्राम कर रहे होते हैं, तब कुछ लोग मोबाइल पर ऊँची आवाज में रील्स देखते हैं, फिल्में चलाते हैं या गाने सुनते हैं। मोबाइल पर इतनी जोर से बातचीत करते हैं मानो पूरा डिब्बा उनकी निजी बैठक हो। कई बार अभद्र भाषा का प्रयोग भी करते हैं, बिना यह समझे कि सार्वजनिक जीवन में कुछ मर्यादाएँ और सामाजिक नियम भी होते हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन व्यवहारों के प्रति समाज की संवेदनशीलता कम होती जा रही है। लोग इन्हीं रास्तों से गुजरते हैं, इसी गंदगी को देखते हैं, इन्हीं समस्याओं से प्रभावित होते हैं, लेकिन शायद ही कोई प्रश्न उठाता है। शायद इसलिए कि आजकल असहमति को विरोध और सुझाव को विवाद समझ लिया जाता है। लोग टोकने से बचते हैं, क्योंकि उन्हें अनावश्यक बहस या विवाद का भय रहता है।
लेकिन क्या यह किसी स्वस्थ समाज का संकेत है?
एक आदर्श समाज वह नहीं होता जहाँ समस्याएँ न हों, बल्कि वह होता है जहाँ लोग समस्याओं को देखकर उन्हें सुधारने का प्रयास करें। जहाँ नागरिक सार्वजनिक हित को निजी सुविधा से ऊपर रखें। जहाँ लोग यह समझें कि सड़क, पार्क, रेलवे स्टेशन, बाजार और सार्वजनिक स्थल किसी एक व्यक्ति के नहीं बल्कि पूरे समाज के हैं।
यह भी विचारणीय है कि जो लोग व्यवस्था का हिस्सा हैं, यदि उन्हें स्वयं Civic Sense के महत्व का बोध नहीं है, तो वे इसे प्राथमिकता क्यों देंगे? आखिर व्यवस्था भी तो समाज से ही बनती है। यदि नागरिक जिम्मेदार नहीं होंगे तो केवल नियम और कानून इस समस्या का समाधान नहीं कर सकते। हमने आधुनिकता को अपनाया है।
हमने तकनीक को अपनाया है।
हमने इंटरनेट, मोबाइल, सोशल मीडिया, रील्स, फैशन, बड़े आयोजनों और प्रदर्शन की संस्कृति को अपनाया है।
लेकिन क्या हमने सामाजिक अनुशासन, सार्वजनिक जिम्मेदारी और नागरिक कर्तव्यों को उतनी गंभीरता से अपनाया है?यह प्रश्न हम सभी से है।
क्योंकि किसी राष्ट्र की पहचान केवल उसकी जीडीपी, ऊँची इमारतों, एक्सप्रेस-वे या भव्य आयोजनों से नहीं होती। उसकी पहचान इस बात से भी होती है कि उसके नागरिक सार्वजनिक स्थानों का कितना सम्मान करते हैं, दूसरों की सुविधा का कितना ध्यान रखते हैं और समाज के प्रति कितनी जिम्मेदारी महसूस करते हैं। स्वच्छ सड़कें केवल सफाई कर्मचारियों से नहीं बनतीं, अनुशासित यातायात केवल पुलिस से नहीं चलता, और सभ्य समाज केवल कानूनों से नहीं बनता। इसके लिए प्रत्येक नागरिक को स्वयं अपने व्यवहार का मूल्यांकन करना पड़ता है।
शायद समय आ गया है कि हम दूसरों की गलतियों पर चर्चा करने से पहले स्वयं से कुछ प्रश्न पूछें— क्या मैं सार्वजनिक स्थानों को उतना ही स्वच्छ रखता हूँ जितना अपना घर?
क्या मैं दूसरों की सुविधा का ध्यान रखता हूँ?
क्या मेरा व्यवहार समाज को बेहतर बना रहा है या समस्याएँ बढ़ा रहा है?
क्योंकि अंततः किसी भी समाज का स्तर उसके नेताओं, अधिकारियों या भवनों से नहीं, बल्कि उसके सामान्य नागरिकों की दैनिक आदतों से तय होता है। यह विषय आलोचना का नहीं, आत्ममंथन का है। और शायद यही आत्ममंथन एक बेहतर, स्वच्छ, संवेदनशील और जिम्मेदार समाज की शुरुआत बन सकता है। :::
