प्रदेश के इतिहास में पहली बार विश्वविद्यालय कुलाधिपति को हाईकोर्ट का नोटिस, हलचल

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Newzo - News Editor 225 Views
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जबलपुर। न्याय जगत में इस समय एक अनूठा और बेहद गंभीर मामला चर्चा का विषय बना हुआ है जहां मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की मुख्य पीठ जबलपुर ने एक विश्वविद्यालय से जुड़े अवमानना के पुराने मामले में अत्यंत कड़ा और ऐतिहासिक रुख अपनाया है। न्यायालय द्वारा इस पूरी कानूनी कार्यवाही के अंतर्गत प्रदेश के राज्यपाल एवं कुलाधिपति मंगुभाई सी. पटेल, रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. रविशंकर सोनवाल तथा उप-कुलसचिव स्थापना पवन साहू को औपचारिक रूप से नोटिस जारी करते हुए अदालत में उपस्थित होकर अपना जवाब प्रस्तुत करने का सख्त निर्देश दिया गया है। प्राप्य जानकारी और कानूनी इतिहास के अनुसार संभवतः प्रदेश के पूरे न्यायिक इतिहास में यह पहला ऐसा अनोखा अवसर है जब विश्वविद्यालय स्तर के किसी प्रशासनिक विवाद या मामले में सीधे तौर पर राज्य के कुलाधिपति पद पर आसीन महामहिम को न्यायालय की तरफ से नोटिस जारी किया गया है। इस अप्रत्याशित और सनसनीखेज कानूनी कदम के सामने आने के बाद से ही रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के प्रशासनिक परिसरों से लेकर सीधे भोपाल स्थित राजभवन के गलियारों तक भारी हड़कंप मचा हुआ है और हर कोई इस उच्चस्तरीय मामले के आगामी परिणामों पर अपनी पैनी नजर गड़ाए बैठा है।

कुलाधिपति को नोटिस जारी करने का आदेश

    ​यह संपूर्ण कानूनी विवाद रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्राध्यापक डॉ. आरबी दुबे द्वारा दायर की गई मूल याचिका और उसके उपरांत अदालत द्वारा दिए गए पुराने आदेशों का पालन न किए जाने के कारण उत्पन्न हुआ है। पूर्व में न्यायालय द्वारा पारित किए गए आदेशों की लगातार अनदेखी किए जाने से आहत होकर प्रार्थी पक्ष की तरफ से जबलपुर उच्च न्यायालय के समक्ष एक अवमानना याचिका संख्या 3247/2026 दायर की गई थी। इस महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई करते हुए माननीय न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने न्यायहित में बड़ा कदम उठाते हुए यह स्पष्ट किया कि पूर्व में 15 जून 2026 को दिए गए आदेश का पालन न होने के कारण सभी नामित अनावेदकों को आरडी मोड के माध्यम से औपचारिक नोटिस भेजकर उनकी जवाबदेही तय की जाए।

    इस्तीफा वापस लेने का कानूनी अधिकार

      ​इस पूरे प्रकरण की मूल पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो डॉ. आरबी दुबे को 10 मई 2000 को रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में रीडर के पद पर नियुक्त किया गया था जिन्होंने बाद में अपना त्यागपत्र सौंपते हुए उसे 29 जुलाई 2006 से प्रभावी करने का विशेष अनुरोध किया था। हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन ने नियत तिथि से पहले ही 14 जुलाई को उनके द्वारा अपना इस्तीफा लिखित रूप से वापस ले लिए जाने के बावजूद 13 जुलाई 2006 को एकतरफा आदेश जारी कर उनका इस्तीफा स्वीकार करने की बात कही जो पूरी तरह से विधि विरुद्ध था। इस मामले की पूर्व में सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति मनिंदर एस. भट्टी की पीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के स्थापित और अकाट्य कानूनी सिद्धांतों का हवाला देते हुए यह सुस्पष्ट व्यवस्था दी थी कि किसी भी कर्मचारी को अपना इस्तीफा प्रभावी होने या स्वीकार किए जाने से पहले उसे वापस लेने का पूर्ण और वैधानिक अधिकार प्राप्त होता है।

      वेतनों के भुगतान को लेकर कानूनी संघर्ष

        ​अदालत द्वारा पूर्व में यह स्पष्ट कर दिया गया था कि कानून की स्थापित और सर्वमान्य स्थिति यही कहती है कि प्रभावी होने की निर्धारित तिथि से पहले प्रेषित त्यागपत्र को आसानी से वापस लिया जा सकता है, इसलिए समय रहते विधिवत वापस लिए गए इस्तीफे को पूरी तरह से नजरअंदाज कर उसे जबरन मंजूर करना किसी भी स्थिति में कानूनी कसौटी पर खरा नहीं उतरता है। उच्च न्यायालय से अपने पक्ष में मिली इस बड़ी और महत्वपूर्ण कानूनी राहत के बाद अब प्रार्थी डॉ. आरबी दुबे अपने लंबे समय से रुके हुए और बचे हुए समस्त वेतनों तथा अन्य बकाया भुगतानों को पूरी तरह से प्राप्त करने के लिए न्याय की आस में निरंतर न्यायालय की शरण में संघर्ष कर रहे हैं। इस मामले की अगली निर्धारित सुनवाई 4 अगस्त को तय की गई है जिसके दौरान यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि विश्वविद्यालय प्रशासन और राजभवन की उच्चाधिकारी विधिक टीम की ओर से अदालत के समक्ष क्या नया रुख अपनाया जाता है।

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