जबलपुर: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, हाजी अब्दुल रज्जाक को मिली जमानत

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Newzo - News Editor 4 Views
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सरकारी पक्ष के बदले रुख के बाद अदालत से बड़ी राहत

जबलपुर। ​उच्चतम न्यायालय के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने जबलपुर के ओमती थाना अंतर्गत दर्ज FIR 257/2023 से जुड़े मामले में अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पेशल लीव टू अपील 271/2026 पर सुनवाई करते हुए मुख्य आरोपी हाजी अब्दुल रज्जाक को नियमित जमानत प्रदान कर दी है। शीर्ष अदालत ने यह राहत मुकदमे की सुनवाई में संभावित देरी और अभियोजन पक्ष के बदलते रवैये को आधार बनाकर दी है। इस पूरे प्रकरण में याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी अधिवक्ता पवन रेले, अनमोल खेता और शरिक़ अकील फारूकी ने की। अदालत ने साफ किया कि आरोपी की रिहाई निचली अदालत द्वारा तय की जाने वाली शर्तों के आधार पर होगी। इस निर्णय से लंबे समय से चल रही कानूनी प्रक्रिया में एक नया मोड़ आ गया है।

अभियोजन पक्ष ने पूर्व में दिया था भरोसा

​न्यायिक प्रक्रिया के दौरान 27 जुलाई 2026 को हुई पिछली पेशी में अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने पीठ को आश्वस्त किया था कि ट्रायल को बिना रुकावट तय समय पर पूरा कराया जाएगा। उस समय सरकारी पक्ष ने धारा 311 CrPC और धारा 348 BNSS के तहत गवाहों को दोबारा बुलाने संबंधी अपनी अर्जी पर आगे न बढ़ने की सहमति दी थी। इसके अलावा सह-अभियुक्त से जुड़ी हैंडराइटिंग एक्सपर्ट रिपोर्ट के कारण भी कानूनी कार्रवाई को न रोकने की बात कही गई थी, जिससे मामले का जल्द निपटारा होने की उम्मीद बनी थी।

सरकारी वकीलों ने अचानक बदला अपना पुराना रुख

​ताजा सुनवाई के दौरान जांच एजेंसी और अभियोजन ने अपने पूर्व आश्वासन से कदम पीछे खींच लिए। उन्होंने गवाहों को दोबारा समन करने और विशेषज्ञ की हस्तलेख रिपोर्ट को आधिकारिक रिकॉर्ड पर शामिल कराने की नई मांग रखी। अभियोजन की ओर से आए इस बदलाव के कारण केस का फैसला आने में लंबा समय लगने के आसार बन गए। दोनों जजों की खंडपीठ ने इस स्थिति का संज्ञान लिया और माना कि प्रक्रियागत लेती-देती के चलते आरोपी को जेल में बनाए रखना उचित नहीं होगा।

केस लटकाने पर सुप्रीम कोर्ट जाने की छूट

​अदालत ने पूर्व में तय की गई समय-सीमा और सरकारी पक्ष के लिखित वादे को समाप्त कर दिया है। इसके साथ ही पीठ ने निर्देश दिया है कि यदि आरोपी स्वयं सुनवाई को टालने का प्रयास करता है या प्रक्रिया में बाधा डालता है, तो अभियोजन पक्ष अथवा ट्रायल कोर्ट उचित आदेश प्राप्त करने के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं। यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि जमानत मिलने के बाद भी मुकदमे की निष्पक्षता और निरंतरता बनी रहे।

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