एमएसएमई विभाग के प्रभार आदेशों से उपजा तीव्र गतिरोध, मध्य प्रदेश में कनिष्ठों के अधीन काम करेंगे वरिष्ठ अधिकारी

जबलपुर। मध्य प्रदेश के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) विभाग में हुए नए प्रशासनिक बदलावों ने मैदानी स्तर पर एक अभूतपूर्व असंतोष को जन्म दे दिया है। विभाग के भीतर यह गंभीर आरोप लग रहे हैं कि स्थापित नियमों की अनदेखी करके चहेतों को उपकृत किया गया है। नियमित चयन प्रक्रिया से आए वरिष्ठ अधिकारियों के अधिकारों को कुचलते हुए प्रभारी प्रबंधकों को जिला व्यापार एवं उद्योग केंद्रों (डीआईसी) के महाप्रबंधक जैसे महत्वपूर्ण पदों पर बैठा दिया गया है। 15 और 16 जून को जारी इन विवादास्पद आदेशों के बाद से अधिकारियों का गुस्सा फूट पड़ा है। इस पूरी व्यवस्था का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि कई जिलों में कनिष्ठ श्रेणी-3 के कर्मचारियों को उच्च श्रेणी-2 के राजपत्रित अधिकारियों के ऊपर नियुक्त कर दिया गया है। अब ये कनिष्ठ कर्मचारी ही अपने से वरिष्ठ अधिकारियों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट यानी सीआर लिखेंगे।
कनिष्ठ कर्मचारियों को मिला वरिष्ठों की सीआर लिखने का हक
इस हैरान करने वाले फैसले को स्थापित सेवा नियमों और पुरानी प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सीधा प्रहार माना जा रहा है। विभागीय सूत्रों के अनुसार प्रभार के ऊपर प्रभार सौंपने की इस नई नीति से पूरी कार्यप्रणाली पटरी से उतर गई है। जिन कर्मचारियों का वास्तविक मूल पद सिर्फ सहायक प्रबंधक का है और वे वर्तमान में प्रभारी प्रबंधक के रूप में काम देख रहे हैं, उन्हें सीधे महाप्रबंधक का प्रभार थमा दिया गया है। दूसरी ओर मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (एमपीपीएससी) के माध्यम से वर्ष 2016, 2017 और 2019 बैच से नियमित रूप से नियुक्त हुए 60 से अधिक राजपत्रित अधिकारी इस समय विभाग में सेवाएं दे रहे हैं। इन उपेक्षित अधिकारियों में प्रबंधक और सहायक संचालक स्तर के कई योग्य चेहरे शामिल हैं, जिन्हें इस फेरबदल में पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया है।
स्थापित मानकों को कुचलकर बांटे गए मलाईदार शासकीय प्रभार
पूर्ण योग्यता और नियमित रूप से चयनित अधिकारियों की उपलब्धता होने के बाद भी प्रभारी प्रबंधकों को उच्च पदों की जिम्मेदारी सौंपने से नाराजगी चरम पर है। अधिकारियों का तर्क है कि जब विभाग में उच्च पदों के लिए पात्रता रखने वाले नियमित अधिकारी पहले से ही तैनात हैं, तो इस तरह की कामचलाऊ प्रभारी व्यवस्था लागू करने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं था। इस अप्रत्याशित कदम से विभाग के भीतर वरिष्ठता क्रम, लंबे मैदानी अनुभव और योग्यता के स्थापित मानकों का खुला उल्लंघन हुआ है। कर्मचारियों के बीच अब यह सुगबुगाहट बेहद तेज है कि इन महत्वपूर्ण नियुक्तियों में किसी भी प्रकार की पारदर्शिता या वरिष्ठता का रत्ती भर भी ध्यान नहीं रखा गया है।
लंबे समय से लंबित पदोन्नतियां रुकने से फूटा आक्रोश
इस भारी विरोध की एक मुख्य वजह यह भी है कि विभाग में लंबे समय से नियमित पदोन्नतियां पूरी तरह से ठप पड़ी हैं। एक तरफ जहां जायज प्रमोशन की फाइलें धूल खा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रभार व्यवस्था के शॉर्टकट से उच्च पदों को मनमाने ढंग से वितरित किया जा रहा है। नियमानुसार यदि नियमित पदोन्नति की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पा रही थी, तो शासन को कोई अन्य नियमित वैकल्पिक रास्ता अपनाना चाहिए था। इस तरह की प्रभारी नियुक्तियों के माध्यम से प्रशासनिक रीढ़ को कमजोर किया जा रहा है। विशेषज्ञों का भी साफ मानना है कि इस जूनियर-सीनियर विवाद के कारण सरकारी कामकाज की गोपनीयता, सेवा अनुशासन और विभागीय कार्यों की गुणवत्ता पर बेहद नकारात्मक असर पड़ेगा।
