
क्रूज संचालकों के पास नहीं था पर्यावरण प्रमाण पत्र, उपभोक्ता मंच ने आयोग के सामने रखीं अनियमितताएं
जबलपुर। नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच द्वारा दायर एक महत्वपूर्ण याचिका पर आज जांच आयोग के अध्यक्ष जस्टिस संजय द्विवेदी के समक्ष सुनवाई हुई। इस दौरान मंच के अध्यक्ष डॉ. पी.जी. नाजपांडे और अधिवक्ता वेदप्रकाश अधौलिया ने कलेक्टर कार्यालय के कमरा नंबर 43 में उपस्थित होकर यह याचिका दाखिल की। याचिका में प्रमुखता से यह कानूनी बिंदु उठाया गया है कि इंडियन वेसेल्स एक्ट 2021 के तहत देश या प्रदेश के कानून में ऐसा कोई भी प्रावधान या उल्लेख नहीं है जो जांच प्रक्रिया पूरी होने से पहले किसी भी दुर्घटनाग्रस्त क्रूज को नष्ट करने की अनुमति देता हो। इसके साथ ही जिला प्रशासन के पास भी किसी हादसे का शिकार हुए क्रूज को जांच से पहले नष्ट करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। इस गंभीर विषय को अत्यंत संवेदनशीलता से लेते हुए जांच आयोग ने स्पष्ट किया है कि नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच द्वारा उठाए गए इन सभी वैधानिक बिंदुओं को जांच के दौरान प्रमुखता के साथ शामिल किया जाएगा और इसके साथ ही आगामी जांच प्रक्रिया के दौरान मंच को अपनी बात रखने के लिए पुनः सुनवाई का पूरा अवसर प्रदान किया जाएगा।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के नियमों की अनदेखी, क्रूज की फिटनेस पर उठे गंभीर सवाल
सुनवाई के दौरान नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच ने क्रूज के संचालन में हुई गंभीर तकनीकी और पर्यावरणीय अनियमितताओं को उजागर किया। याचिका में साक्ष्यों के साथ बताया गया कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने 12 सितंबर 2023 को अपने एक स्पष्ट आदेश में यह अनिवार्य किया था कि पानी में चलने वाले ऐसे क्रूज में केवल फोर स्ट्रोक इंजन का ही उपयोग होना चाहिए। इसके विपरीत नियमों को ताक पर रखकर दुर्घटनाग्रस्त क्रूज में मात्र 100 एच.पी. का बेहद कमजोर इंजन लगाया गया था, और संचालन के दौरान उसका दूसरा इंजन भी पूरी तरह फेल हो गया था। एन.जी.टी. के कड़े नियमानुसार जल संरचनाओं में चलने वाले वाहनों के लिए पर्यावरण के तय मानकों और नियमों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य था, परंतु इस क्रूज के संचालकों के पास पर्यावरण से संबंधित ऐसा कोई भी वैध प्रमाण पत्र मौजूद नहीं था, जो सीधे तौर पर नियमों के उल्लंघन को दर्शाता है।
बोट नष्ट होने पर फिटनेस आकलन की चुनौती, जांच आयोग द्वारा चिंता व्यक्त
जांच आयोग के समक्ष सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण सवाल यह खड़ा हुआ है कि जब दुर्घटनाग्रस्त क्रूज को पहले ही पूरी तरह नष्ट कर दिया गया है, तो अब तकनीकी रूप से उसकी फिटनेस की जांच किस आधार पर की जाएगी। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के आदेश के पैरा 132 में यह साफ तौर पर निर्देशित किया गया है कि किसी भी जलवाहन या बोट के संचालन में उसकी फिटनेस को पहली प्राथमिकता दी जानी चाहिए। बोट के नष्ट हो जाने के बाद उसकी भौतिक और तकनीकी स्थिति का आकलन करना अब नामुमकिन नजर आ रहा है। इस संवेदनशील बिंदु पर जांच आयोग ने भी अपनी गहरी चिंता व्यक्त की है। आयोग ने मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिकाकर्ताओं को स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि वे इस पूरे घटनाक्रम और दावों से संबंधित सभी आवश्यक और महत्वपूर्ण दस्तावेज आयोग के समक्ष प्रस्तुत करें ताकि मामले की तह तक पहुंचा जा सके।
