
बधाई हो जबलपुर वालों! अपनी किस्मत पर इतराइए और चौपाटी पर जाकर दो प्लेट मंगौड़े खाइए, क्योंकि आपके शहर को एक ऐसा ‘अवतारी पुरुष’ मिला है, जिसका सेवा भाव देखकर खुद सेवा शब्द भी शरमा जाए। अमूमन अफसर ट्रांसफर की जुगाड़ में रहते हैं कि कब इस ‘तपते’ शहर से मुक्ति मिले, लेकिन हमारे साहब? वाह! जबलपुर की जनता से उन्हें ऐसा ‘लइया-गुड़’ वाला प्रेम हुआ कि जैसे ही ट्रांसफर की भनक लगी, साहब सीधे भोपाल की ट्रेन पकड़ लिए। कहते हैं लाखों का ‘यज्ञ’ अनुष्ठान किया गया, तब जाकर ट्रांसफर रुका। अब कुटिल लोग कह रहे हैं कि साहब को कुर्सी का मोह है, मलाईदार इलाका छोड़ना नहीं चाहते। अरे दुष्टों! शर्म करो। साहब क्या अपनी जेब ढीली करके, इतनी कड़कती धूप में भोपाल की परिक्रमा मलाई खाने के लिए कर रहे थे? नहीं! वो तो बस जबलपुर की धूल, धुएं और आप जैसे असंतुष्टों की सेवा करने के लिए तड़प रहे थे। शिकायती लोगों की तो आदत ही होती है उंगली उठाने की। पहले दिन से रोना रो रहे हैं कि साहब फील्ड पर नहीं दिखते, जनता से मिलते नहीं। अरे भाई, तुम क्या चाहते हो कि साहब २४ घंटे धूप में काला चश्मा लगाकर घूमते रहें? अफसर हैं, कोई गली के गश्त वाले नहीं! वो वातानुकूलित केबिन में बैठकर, फाइलों के भीतर जबलपुर की जनता का भविष्य बुन रहे होते हैं। तुम्हें क्या पता कि एसी की हवा में बैठकर जनता की चिंता में कितनी ‘कैलोरी’ बर्न होती है? जनता चाहती है कि अफसर उनके लिए हमे8 खड़ा रहे। क्यों भाई? अफसर ने दिन-रात पढ़ाई करके, इतनी बड़ी कुर्सी क्या इसलिए पाई थी कि सुबह-शाम तुम्हारी मान-मनौव्वल करे? उनके अपने भी तो काम हैं, आखिर वीआईपी कल्चर को भी तो जिंदा रखना है! व्यवस्था के मुंह पर तमाचा मारते इस सिस्टम को देखिए, जनता चिल्लाती रही कि “साहब काम नहीं कर रहे, ट्रांसफर करो”, और साहब ने पूरी ताकत लगाकर कह दिया, “लो, हम यहीं रहेंगे और अब और ज्यादा सेवा करेंगे!” इसे कहते हैं लोकतंत्र का असली ‘अपग्रेड वर्जन’। जहाँ जनता की शिकायत का इनाम अफसर को उसी कुर्सी पर दोबारा चिपक कर मिलता है। ऐसे अदम्य, साहसी और कुर्सी-प्रेमी… सॉरी, जनता-प्रेमी अधिकारी को जबलपुर का कोटि-कोटि नमन। आप जमे रहिए साहब, जब तक कुर्सी खुद न कह दे,बस करो प्रभु, अब और सेवा नहीं झेली जाती!
