
जबलपुर। ऐतिहासिक हनुमान ताल तालाब के सौंदर्यीकरण और जीर्णोद्धार का काम भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के दो स्थानीय नेताओं के बीच वर्चस्व की लड़ाई की भेंट चढ़ गया है। इस जलाशय को सजाने और संवारने के लिए प्रशासन द्वारा कुल 1.25 करोड़ रुपए का बजट स्वीकृत किया गया था, जिसके तहत शुरुआती दौर में 30 लाख रुपए की लागत से तालाब की गंदगी और सिल्ट की सफाई का काम सफलतापूर्वक पूरा भी कर लिया गया था। इस प्रारंभिक सफलता के बाद जब योजना के अगले चरण में घाटों का निर्माण और सौंदर्यीकरण का काम शुरू होना था, तभी भाजपा के एक गुट के नेता ने इस पूरे कार्य का श्रेय लेने की होड़ में तालाब के आसपास बड़े-बड़े बैनर और पोस्टर लगवा दिए। इस प्रचार युद्ध से नाराज होकर जमीनी स्तर पर फंड का इंतजाम कर रहे दूसरे भाजपा नेता ने विकास कार्यों पर पूरी तरह रोक लगा दी, जिसके बाद से यह काम अधर में लटका हुआ है। वर्तमान में दोनों नेताओं की इस आपसी खींचतान और बैनर-पोस्टर की जंग के कारण जनता को मिलने वाली एक बड़ी सौगात रुक गई है, जबकि संगठन के भीतर इस आंतरिक विवाद को लेकर तीखी चर्चाएं चल रही हैं।
वर्चस्व की जंग ले डूबी विकास
हनुमान ताल को एक सुंदर पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की योजना बहुत तेज गति के साथ शुरू की गई थी। प्रथम चरण में 30 लाख रुपए खर्च कर पानी को साफ करने और बरसों जमी गाद को निकालने का काम समय पर पूरा हुआ था। इसके तुरंत बाद ही नए घाटों का निर्माण और लाइटिंग की व्यवस्था की जानी थी, लेकिन श्रेय लेने की राजनीति ने पूरे प्रोजेक्ट पर पानी फेर दिया। नेताओं के अहम के टकराव के चलते निर्माण एजेंसियों ने भी काम से दूरी बना ली है, जिससे अब तक हुआ काम भी बेकार हो रहा है।
प्रचार के तूफान से संगठन में नाराजगी
पोस्टरबाजी के इस दौर के बाद राजनीतिक गलियारों और संगठन के भीतर भी इस बात को लेकर गंभीर मंथन चल रहा है कि विकास कार्यों में आत्मप्रशंसा का यह तरीका बिल्कुल ठीक नहीं है। चूंकि विवाद सत्ताधारी दल के दो कद्दावर चेहरों के बीच का है, इसलिए संगठन का कोई भी अन्य पदाधिकारी या जनप्रतिनिधि इस मामले में खुलकर कुछ भी बोलने से बच रहा है। अंदरूनी बैठकों में इस बात पर चिंता जताई जा रही है कि नेताओं के इस रवैए से जनता के बीच पार्टी की छवि पर विपरीत असर पड़ रहा है।
जनता की खामोशी के मायने
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा नुकसान स्थानीय जनता और हनुमान ताल की पहचान को हुआ है, क्योंकि समय पर काम पूरा होने से इस क्षेत्र की रौनक काफी बढ़ जाती। शुरुआत में कुछ सामाजिक संगठनों और नागरिकों ने काम रुकने की वजह जानने की कोशिश की थी और विभिन्न माध्यमों से सवाल भी पूछे थे, लेकिन कहीं से कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। अब धीरे-धीरे आम जनता की ओर से भी इस मुद्दे पर आवाज उठाना बंद कर दिया गया है, जिससे विकास की उम्मीदें पूरी तरह धुंधली हो गई हैं।
सच्चाई जानकर भी संगठन मौन
इस पूरे मामले की हकीकत और पर्दे के पीछे की कहानी से भाजपा का शीर्ष नेतृत्व और स्थानीय स्तर के सभी नेता पूरी तरह वाकिफ हैं। उन्हें अच्छी तरह पता है कि यह काम किस वजह से रुका है और इसके लिए कौन जिम्मेदार है, लेकिन इसके बावजूद पूरी व्यवस्था में चुप्पी छाई हुई है। आपसी द्वंद्व का यह नासूर तालाब के अस्तित्व के लिए खतरा बन चुका है और जब तक इस गतिरोध को दूर नहीं किया जाता, तब तक 1.25 करोड़ रुपए की इस बड़ी योजना का धरातल पर उतरना नामुमकिन नजर आ रहा है।
