
जबलपुर। सूचना के अधिकार यानी आरटीआई की अनदेखी करना पुलिस के दो आला अधिकारियों को भारी पड़ गया है। राज्य सूचना आयोग ने सख्त रवैया अपनाते हुए तत्कालीन अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक संजय अग्रवाल और गोरखपुर थाने के तत्कालीन प्रभारी अरविंद चौबे पर 25-25 हजार रुपए का आर्थिक दंड लगाया है। यह मामला ग्वारीघाट के आदर्श नगर में रहने वाले अजीत सिंह आनंद से जुड़ा है, जिन्होंने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए जानकारी मांगी थी। पीड़ित का आरोप था कि जून 2023 में उन्हें बिना वजह 24 घंटे से ज्यादा समय तक थाने में बैठाकर रखा गया था। रिहाई के बाद पीड़ित ने जब सीसीटीवी फुटेज और रोजनामचा मांगा, तो पुलिस ने आनाकानी शुरू कर दी। अब आयोग ने इन अफसरों को अगली सुनवाई में तलब कर लिया है।
पारदर्शी व्यवस्था के आगे पुलिस के बहाने फेल
घटनाक्रम के अनुसार 20 जून 2023 को पुलिस अजीत सिंह आनंद को अपने साथ ले गई थी। पीड़ित ने जब अपनी गिरफ्तारी और थाने में बिताए समय का प्रमाण मांगा, तो उसे गुमराह किया गया। थाना प्रभारी ने जानकारी देने से हाथ खड़े कर लिए, जिसके बाद एएसपी संजय अग्रवाल के सामने अपील दायर की गई। एएसपी ने रोजनामचा सान्हा देने का निर्देश तो दिया, लेकिन निजता का हवाला देकर सीसीटीवी फुटेज देने से साफ इनकार कर दिया। एएसपी के आदेश के बावजूद पीड़ित के हाथ खाली ही रहे। राज्य सूचना आयोग ने पूरी पड़ताल की और पाया कि अधिकारियों ने न केवल जानकारी दबाई, बल्कि आवेदक को अनावश्यक परेशान भी किया। नियमों की यह अनदेखी अब पुलिस अफसरों को महंगी पड़ गई है।
अगली पेशी पर व्यक्तिगत रूप से देना होगा जवाब
राज्य सूचना आयोग ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए दोनों अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। आगामी 7 अगस्त को होने वाली सुनवाई के दौरान इन अफसरों को आयोग के सामने व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना अनिवार्य कर दिया गया है। आयोग का यह फैसला स्पष्ट करता है कि सरकारी महकमों में पारदर्शिता से समझौता नहीं किया जा सकता है। समय पर आवेदन का निराकरण न करना और आम आदमी को सूचना के अधिकार से वंचित रखना अधिकारियों के लिए बड़ी मुसीबत बन गया है। इस कार्रवाई ने पूरे प्रशासनिक तंत्र में एक कड़ा संदेश दिया है कि आरटीआई का सम्मान करना हर जिम्मेदार अधिकारी का कर्तव्य है। अब सबकी निगाहें 7 अगस्त की सुनवाई पर टिकी हैं कि आयोग आगे क्या कदम उठाता है।
