परियट नदी की बदहाली से जबलपुर की 500 करोड़ की डेयरी अर्थव्यवस्था पर संकट

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Newzo - News Editor
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राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने किया प्रभावित इलाकों का दौरा,दूषित पानी पीने से बीमार हो रहे दुधारू मवेशी, दुग्ध उत्पादन में आई भारी गिरावट

जबलपुर। मध्य प्रदेश के जबलपुर में सरकारी तंत्र की भारी अनदेखी के कारण ऐतिहासिक परियट नदी आज एक गंदे नाले के रूप में तब्दील हो चुकी है। इस बेहद गंभीर पर्यावरणीय और आर्थिक संकट को देखते हुए राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने नदी और उसके आसपास फैले डेयरी क्षेत्रों का खुद जमीन पर उतरकर निरीक्षण किया। मौके की हकीकत देखने के बाद उन्होंने मीडिया से बातचीत में स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था पर तीखा प्रहार किया और बताया कि इस लापरवाही के कारण क्षेत्र की लगभग 500 करोड़ रुपये की विशाल डेयरी अर्थव्यवस्था पूरी तरह बर्बादी की कगार पर आ गई है। प्रियंक कानूनगो ने साफ तौर पर कहा कि पानी का मुख्य स्रोत दूषित होने से न केवल पर्यावरण का भारी नुकसान हुआ है, बल्कि हजारों परिवारों का दुग्ध व्यवसाय भी पूरी तरह ठप होने की स्थिति में पहुंच गया है। इस पूरे मामले में मानवाधिकार आयोग ने बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए लापरवाह तंत्र की जवाबदेही तय करने की बड़ी कार्रवाई शुरू कर दी है।

​प्रदूषण के जाल में फंसा जीवनदायिनी नदी का अस्तित्व

​जबलपुर के ग्रामीण इलाकों की लाइफलाइन मानी जाने वाली परियट नदी आज सरकारी विभागों के तालमेल की कमी के कारण अपनी पहचान खो चुकी है। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के निरीक्षण में यह बात सामने आई कि सालों से इस नदी की सफाई और संरक्षण को लेकर कोई गंभीर प्रयास नहीं किए गए। शहर और ग्रामीण हिस्सों का गंदा पानी तथा कचरा लगातार इसमें बहाया गया, जिससे इसका साफ पानी पूरी तरह जहरीला हो गया। अब स्थिति यह हो चुकी है कि इस पानी का उपयोग किसी भी सामान्य काम के लिए नहीं किया जा सकता। इस बढ़ते जल प्रदूषण ने आसपास के पूरे इकोसिस्टम को बिगाड़ कर रख दिया है।

​पशुपालकों और दुग्ध व्यवसाय पर मंडराया रोजी-रोटी का संकट

​इस पूरे क्षेत्र में तकरीबन 500 करोड़ रुपये का डेयरी उद्योग संचालित होता है, जो पूरी तरह इसी नदी के पानी पर निर्भर था। परियट नदी के बेहाल होने से हजारों पशुपालकों और किसानों के सामने अपने मवेशियों को बचाने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। डेयरियों में पलने वाले दुधारू पशुओं को मजबूरी में यह दूषित पानी पीना पड़ रहा है, जिससे वे लगातार गंभीर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। मवेशियों के बीमार होने से दूध के उत्पादन में भारी कमी आई है, जिससे डेयरी संचालकों की लागत बढ़ गई है और मुनाफा खत्म होने लगा है। यह आर्थिक मार इस कारोबार को पूरी तरह चौपट कर रही है।

​लापरवाही पर कसता जा रहा मानवाधिकार आयोग का शिकंजा

​प्रियंक कानूनगो के इस तीखे तेवर के बाद क्षेत्र के जिम्मेदार अधिकारियों में हड़कंप मचा हुआ है। जांच में यह स्पष्ट पाया गया कि यदि समय रहते डेयरी क्षेत्रों में सही ड्रेनेज और वेस्ट मैनेजमेंट की व्यवस्था की जाती, तो नदी को गंदा होने से रोका जा सकता था। व्यवस्था की इसी घोर लापरवाही को आधार बनाकर राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग अब एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रहा है। आयोग का मानना है कि लोगों के स्वास्थ्य और उनकी आजीविका कमाने के अधिकार की सुरक्षा करना सबसे जरूरी है, इसलिए इस पूरे नुकसान के जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ आने वाले दिनों में सख्त वैधानिक कदम उठाए जाएंगे।

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