जबलपुर। जबलपुर में आज से 29 साल पूर्व 22 मई 1997 की काली रात को आए विनाशकारी भूकंप की यादें आज भी लोगों के जहन में ताजा हैं। उस रात जब लोग गहरी नींद में सो रहे थे, तब सुबह 4 बजकर 22 मिनट पर आए 6.5 रिक्टर तीव्रता के भूकंप ने पूरे शहर को हिलाकर रख दिया था। इस भयानक त्रासदी में 22 लोगों की जान चली गई थी और कई हजार मकान पल भर में धराशायी हो गए थे। भूकंप का अभिकेन्द्र बरेला रोड पर कोसणघाट के पास था, जहां सैकड़ों गरीबों की बस्तियां पूरी तरह उजड़ गई थीं। इस भीषण आपदा के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल ने जबलपुर के प्रभावित क्षेत्रों का विस्तृत दौरा किया था। इस दौरान नया जबलपुर बसाने और पीड़ितों को राहत देने के बड़े-बड़े वादे किए गए थे, लेकिन 29 साल बीत जाने के बाद भी ये तमाम घोषणाएं सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गईं।
भूकंप वेधशाला स्थापना की खुली पोल
त्रासदी के बाद जबलपुर को भूकंप के प्रति बेहद संवेदनशील जोन मानते हुए यहां एक अत्याधुनिक भूकंपमापी वेधशाला की भारी आवश्यकता महसूस की गई थी। उस समय जल्दबाजी में बरगी के पास एक अस्थायी वेधशाला स्थापित भी की गई थी, लेकिन रखरखाव और प्रशासनिक उदासीनता के कारण वह बाद में बंद हो गई। आज स्थिति यह है कि क्षेत्र में होने वाली किसी भी भूगर्भीय हलचल की सटीक जानकारी के लिए स्थानीय प्रशासन को पूरी तरह से दिल्ली वेधशाला पर निर्भर रहना पड़ता है।
राहत राशि और विकास कार्यों का सच
प्रदेश सरकार ने भूकंप पीड़ितों की मदद और पुनर्निर्माण के नाम पर जनता से भूकंप सरचार्ज के रूप में 5 साल तक कुल 600 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि इकट्ठा की थी। इसके बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि इस राशि में से एक फूटी कौड़ी भी जबलपुर के विकास या पीड़ितों के पुनर्वास के लिए नहीं मिली। शहर के नाम पर केवल एक या दो सड़कों का निर्माण कराकर औपचारिकता पूरी कर ली गई। न तो नया जबलपुर धरातल पर बन पाया और न ही प्रभावित परिवारों को बैंक लोन पर ब्याज माफी की कोई राहत मिल सकी।
आपदा प्रबंधन के इंतजामों की हकीकत
भूकंप के समय राहत और बचाव कार्य को लेकर जो कड़वे अनुभव सामने आए थे, उसे लेकर शासन-प्रशासन की काफी किरकिरी हुई थी। समय बीतने के साथ ही सुरक्षा को लेकर सारी गंभीरता ठंडी पड़ गई। वर्तमान में शहर के अस्पतालों में न तो आपातकालीन स्थितियों से निपटने की कोई व्यापक व्यवस्था है और न ही वार्ड स्तर पर प्रशिक्षित नागरिक वॉलंटियर्स तैयार किए गए हैं। कलेक्ट्रेट में दिखावे के लिए एक आपदा प्रबंधन शाखा खोली जरूर गई थी, लेकिन अब उसका काम केवल साल में एक बार भूकंप की बरसी पर मॉकड्रिल या रिहर्सल करने तक ही सीमित रह गया है।
वादों और जमीनी हकीकत का अंतर
मई के महीने में भीषण गर्मी होने की वजह से हादसे की रात अधिकांश लोग अपने घरों के बाहर सो रहे थे, जिससे जनहानि का आंकड़ा बहुत ज्यादा नहीं बढ़ा, लेकिन भौतिक नुकसान बड़े पैमाने पर हुआ था। इतने वर्षों में शहर की सुरक्षा और विकास को लेकर किए गए तमाम दावे पूरी तरह झूठे साबित हुए हैं। बड़ी त्रासदियों को भुला देने की प्रशासनिक व्यवस्था के कारण जबलपुर आज भी उसी असुरक्षा और पिछड़ेपन को झेलने के लिए मजबूर है, जिसका सामना उसने तीन दशक पहले किया था।
