फर्जी डॉक्टर कांड: डेढ़ साल तक सरकारी खजाने पर डाला डाका, अधिकारियों को भनक तक नहीं लगी

Newzo
Newzo - News Editor
6 Min Read

जबलपुर।मध्यप्रदेश के स्वास्थ्य महकमे में फर्जी डॉक्टरों की भर्ती का एक बड़ा मामला सामने आया है। दमोह और जबलपुर की संजीवनी क्लीनिक्स में फर्जी एमबीबीएस डिग्री और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के जाली रजिस्ट्रेशन के जरिए नौकरी पाकर सरकार को चूना लगाने वाले तीन कथित डॉक्टरों को पकड़ा गया है। इस फर्जीवाड़े की शुरुआत दमोह से हुई, जहां मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय द्वारा संदेहास्पद दस्तावेजों की जांच कराने के बाद कोतवाली पुलिस ने मामला दर्ज किया था। पुलिस की सघन पूछताछ में जबलपुर के चेरीताल संजीवनी क्लीनिक में पदस्थ अजय मौर्य का नाम सामने आया, जिसे तुरंत हिरासत में ले लिया गया। जांच में पता चला है कि आरोपी अजय मौर्य मार्च 2025 से संविदा पर तैनात था और हर महीने 80 हजार रुपए वेतन उठा रहा था, जबकि वह रोजाना सिर्फ दो घंटे के लिए ही क्लीनिक आता था। इस पूरे गिरोह का पर्दाफाश करते हुए पुलिस ने भोपाल से मुख्य मास्टरमाइंड हीरा सिंह कौशल को भी गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस को राज्य में ऐसे 70 से अधिक और भी फर्जी डॉक्टरों के अलग-अलग जिलों में तैनात होने की गंभीर आशंका है, जिसकी कड़ियां जोड़ी जा रही हैं।

​स्टाफ के भरोसे चलता था मरीजों का इलाज

​संजीवनी क्लीनिक में आने वाले स्थानीय मरीजों के अनुसार, डॉक्टर अजय मौर्य कभी भी नियमित रूप से मरीजों की जांच नहीं करते थे। जब भी वे क्लीनिक आते, तो सीधे अपने केबिन में चले जाते थे और किसी से बात तक नहीं करते थे। क्लीनिक पर तैनात कंप्यूटर ऑपरेटर दुर्गेश नंदनी ने भी इस बात की पुष्टि की है कि उनका आना केवल दो घंटे के लिए होता था। डॉक्टर के इस व्यवहार के कारण पूरा काम वहां मौजूद स्टाफ ही संभालता था। इलाज के लिए आने वाले महेंद्र श्रीवास्तव और राजकुमार नामक मरीजों ने बताया कि वे लंबे समय से वहां आ रहे हैं, लेकिन उन्हें कभी डॉक्टर से परामर्श लेने की जरूरत ही नहीं पड़ी। रजिस्ट्रेशन काउंटर पर बैठा स्टाफ ही मरीजों की बीमारी सुनकर उन्हें सीधे दवाइयां दे देता था, जिससे डॉक्टर की अनुपस्थिति का पता ही नहीं चलता था।

​डेढ़ साल की नौकरी और लाखों का वेतन

​जांच के दौरान यह बात सामने आई है कि पकड़े गए तीनों आरोपियों ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के नियमों का फायदा उठाकर संविदा पर यह नियुक्तियां हासिल की थीं। आरोपी अजय मौर्य पिछले डेढ़ साल से इस पद पर काम कर रहा था और अब तक सरकारी खजाने से 14 लाख रुपए से अधिक का वेतन ले चुका था। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर बिना दस्तावेजों के सही भौतिक सत्यापन के इतनी बड़ी नियुक्तियां कैसे कर दी गईं। डॉक्टरों की कमी का फायदा उठाकर आरोपियों ने इस व्यवस्था में आसानी से सेंध लगा दी। इस मामले में पकड़े गए दो अन्य आरोपियों में ग्वालियर के सचिन यादव और सीहोर के राजपाल गौर शामिल हैं, जो दमोह क्षेत्र में इसी तरह फर्जी दस्तावेजों के आधार पर पिछले दो से ढाई साल से वेतन उठा रहे थे।

​मास्टरमाइंड की गिरफ्तारी और बड़ा नेटवर्क

​दमोह पुलिस अधीक्षक आनंद कलादगी के नेतृत्व में काम कर रही विशेष टीम ने इस पूरे फर्जीवाड़े के मुख्य सूत्रधार हीरा सिंह कौशल को भोपाल से गिरफ्तार करने में सफलता पाई है। पुलिस की शुरुआती पूछताछ में मास्टरमाइंड ने राज्य के कई अन्य जिलों में भी इस तरह के फर्जी डॉक्टरों को नौकरी दिलाने की बात कबूल की है। इस खुलासे के बाद पुलिस की अलग-अलग टीमें संदिग्धों की तलाश में रवाना हो चुकी हैं। अधिकारियों को अंदेशा है कि फर्जी एमबीबीएस डिग्री और जाली मेडिकल रजिस्ट्रेशन तैयार करने के बदले में आरोपियों के बीच बड़े पैमाने पर रुपयों का लेनदेन हुआ है। पुलिस अब उस पूरे तकनीकी नेटवर्क को खंगाल रही है जो कंप्यूटर के जरिए इन जाली दस्तावेजों को असली रूप देने का अवैध काम कर रहा था।

​वॉक इन इंटरव्यू प्रक्रिया पर उठे सवाल

​राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत प्रदेश में डॉक्टरों की कमी को दूर करने के लिए वॉक इन इंटरव्यू के माध्यम से सीधे संविदा भर्ती की जाती है। इसी त्वरित चयन प्रक्रिया का लाभ उठाकर इन जालसाजों ने स्वास्थ्य विभाग में प्रवेश पा लिया। बिना विस्तृत बैकग्राउंड जांच के जल्दबाजी में की गई इन भर्तियों का सीधा नुकसान उन गरीब मरीजों को उठाना पड़ा, जो सरकार की मुफ्त इलाज योजना के भरोसे इन क्लीनिक्स तक पहुंचते हैं। फिलहाल पुलिस विभाग और प्रशासन इस पूरे मामले की तह तक जाने के लिए सभी संविदा डॉक्टरों के मेडिकल काउंसिल रजिस्ट्रेशन की दोबारा जांच कराने की तैयारी में है ताकि भविष्य में जनता के स्वास्थ्य के साथ ऐसा खिलवाड़ न हो सके।

Share This Article