
करोड़पति पूर्व आरक्षक सौरभ शर्मा की अस्थाई जमानत पर हाईकोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला
जबलपुर। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने परिवहन विभाग के पूर्व आरक्षक सौरभ शर्मा की 60 दिन की अस्थाई जमानत याचिका पर सुनवाई पूरी कर अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है। प्रवर्तन निदेशालय द्वारा 108.24 करोड़ रुपए की बेनामी संपत्ति, 51 किलो सोना और संगठित मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क के खुलासे के बाद जेल में बंद मुख्य आरोपी ने समर वेकेशन कोर्ट में जस्टिस विशाल मिश्रा की एकल पीठ के समक्ष यह गुहार लगाई है। पूर्व में जिला अदालत और हाईकोर्ट से नियमित जमानत खारिज होने के बाद इस बार आरोपी ने अपनी पत्नी दिव्या तिवारी की नाक की सर्जरी और दो नाबालिग बच्चों अमीर व सुबीर की देखभाल को मानवीय आधार बनाते हुए कोर्ट से राहत मांगी है। जांच एजेंसियों के कड़े विरोध के बीच अब इस मामले में अगले एक-दो दिनों में अंतिम आदेश आने की संभावना है।
घरेलू संकट और बीमारी को आधार बनाकर मांगी राहत
पूर्व आरक्षक ने अपने आवेदन में चिकित्सीय दस्तावेजों का हवाला देते हुए बताया है कि उसकी पत्नी दिव्या तिवारी गंभीर नेजल सेप्टम क्रॉनिक साइनसिस्टम की बीमारी से पीड़ित है। डॉक्टरों ने उसे जल्द ही फंक्शनल एंडोस्कोपी साइनस सर्जरी कराने की सलाह दी है, जिसके कारण अस्पताल में भर्ती रहने और ऑपरेशन के बाद की रिकवरी अवधि में पति का साथ होना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही आरोपी पक्ष का तर्क है कि घर में कोई दूसरा जिम्मेदार सदस्य मौजूद नहीं है, इसलिए अस्पताल और घर के बीच बच्चों की संभाल के लिए उसे 60 दिन की अस्थाई रिहाई दी जानी चाहिए।
विशाल आर्थिक साम्राज्य और मददगारों पर उठे सवाल
इस मामले में जांच कर रही केंद्रीय एजेंसी ईडी ने आरोपी की दलीलों का विरोध करते हुए कोर्ट के सामने उसके पूरे सिंडिकेट का ब्योरा रखा है। जांच के मुताबिक आरोपी ने अपनी मां उमा शर्मा, सास रेखा तिवारी और करीबी सहयोगियों जैसे चेतन सिंह गौर, शरद जायसवाल व रोहित तिवारी के नाम पर जमीनों, कंपनियों, स्कूलों, पेट्रोल पंपों और बड़े प्रोजेक्ट्स में निवेश कर रखा है। एजेंसी का तर्क है कि जब आरोपी का इतना बड़ा आर्थिक तंत्र और रिश्तेदारों का नेटवर्क बाहर सक्रिय है, तो केवल पत्नी के इलाज और बच्चों की देखभाल के नाम पर उसे राहत देना सही नहीं है।
महज 28000 रुपए वेतन और अरबों के घोटाले का सच
इससे पहले हाईकोर्ट के जस्टिस प्रमोद कुमार अग्रवाल की कोर्ट ने इस मामले को देश का एक बेहद गंभीर संगठित आर्थिक अपराध माना था। कोर्ट रिकॉर्ड के अनुसार महज 28000 रुपए के मासिक वेतन पर काम करने वाले एक अदने से आरक्षक ने अपने सेवाकाल में पद का दुरुपयोग कर अरबों रुपए का साम्राज्य खड़ा कर लिया। पूर्व में अदालत ने साक्ष्यों से छेड़छाड़ की आशंका और अपराध की गंभीरता को देखते हुए नियमित जमानत देने से साफ इनकार कर दिया था, जिसके बाद अब इस नई अस्थाई याचिका के भविष्य पर सबकी नजरें टिकी हैं।
