ठहराव : हकीकत या सबसे बड़ा भ्रम

Newzo
Newzo - News Editor 40 Views
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शशिकांत ओझा, मुख्य जनसंपर्क अधिकारी, पॉवर ट्रांसमिशन कम्पनी

कभी वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन से जुड़ा एक विचार पढ़ा था कि उन्हें “ठहराव” शब्द सबसे अधिक भ्रमित करता है। उनके अनुसार ब्रह्मांड में वास्तव में कुछ भी स्थिर नहीं है; सब कुछ निरंतर गतिमान है, बदल रहा है, रूपांतरित हो रहा है। हमारी दृष्टि को तालाब का पानी स्थिर दिखाई देता है, सड़कें और मकान अचल प्रतीत होते हैं, पर्वत सदियों से एक ही स्थान पर खड़े लगते हैं। किंतु यह स्थिरता केवल हमारी इंद्रियों का भ्रम है। सूक्ष्म स्तर पर सब कुछ बदल रहा है, बह रहा है, समय के साथ नया रूप ले रहा है। तालाब का शांत जल हर क्षण परिवर्तित हो रहा होता है। सूर्य उसकी नमी को अपने साथ ले जाता है, हवा उसे स्पर्श कर बदल देती है, वर्षा उसमें नया जल जोड़ देती है। वह रुका हुआ नहीं है, केवल उसकी गति हमारी अनुभूति से धीमी है।

पत्थर भी स्थिर नहीं है। वह हजारों वर्षों की यात्रा का एक क्षण भर है—कभी मिट्टी था, फिर चट्टान बना और एक दिन फिर धूल में विलीन हो जाएगा। उसकी गति इतनी मंद है कि हमारी आँखें उसे पकड़ नहीं पातीं।
मनुष्य भी इससे अलग नहीं। हम स्वयं को वही व्यक्ति मानते हैं जो वर्षों पहले थे, जबकि प्रतिदिन कुछ न कुछ बदल रहा होता है। विचार, विश्वास, भावनाएँ, इच्छाएँ और यहाँ तक कि शरीर की कोशिकाएँ भी निरंतर परिवर्तनशील हैं। जो कल था, वह आज नहीं है; जो आज है, वह कल नहीं रहेगा। यहीं एक रोचक प्रश्न जन्म लेता है—क्या सत्य और असत्य भी समय-सापेक्ष हैं? शायद नहीं। परिवर्तन सत्य हो सकता है, पर परिवर्तन के बीच भी कुछ मूल तत्व ऐसे होते हैं जो हर युग में प्रासंगिक बने रहते हैं। अनुभव कहता है कि सत्य का स्वरूप बदल सकता है, उसका आधार नहीं।
शायद जीवन को समझने के लिए ठहराव नहीं, प्रवाह को समझना होगा। इस संसार में जो दिखाई देता है वह स्थिर हो सकता है, पर जो वास्तव में है, वह निरंतर गतिशील है।

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