
जबलपुर। जिले में रेत उत्खनन और व्यापार की स्थिति पूरी तरह पटरी से उतर चुकी है। खनिज विभाग द्वारा जिले की 31 रेत खदानों के लिए चौथी बार निविदा प्रक्रिया आयोजित की गई, लेकिन एक भी ठेकेदार ने इसमें रुचि नहीं दिखाई है। दरअसल, इससे पहले विभाग ने 42 खदानों में से 31 को ही अनुमति दी थी। ठेकेदारों की इस उदासीनता का बड़ा कारण सरकार द्वारा निर्धारित अत्यधिक प्राइज मनी को माना जा रहा है। ठेकेदारों का स्पष्ट कहना है कि वर्तमान दरों पर ठेका लेना घाटे का सौदा है। इस स्थिति के चलते लगातार चौथे प्रयास के बाद भी कोई ठोस परिणाम नहीं निकला है। विभाग अब 7 जुलाई को पांचवीं बार निविदा बुलाने की तैयारी में जुटा है। पिछले 8 महीनों से जिले की खदानों से वैध तरीके से रेत नहीं निकली है, जिससे सरकार को करोड़ों रुपए का राजस्व नुकसान हो रहा है।
ऊंची प्राइज मनी से ठेकेदारों ने बनाई दूरी
जिले में रेत के ठेके लेने से ठेकेदार लगातार परहेज कर रहे हैं। रेत व्यवसाय से जुड़े लोगों का मानना है कि यदि वे इतने ऊंचे दामों पर निविदा भरते हैं, तो उन्हें व्यापार में भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा। इसी वजह से पिछले 8 महीनों से जिले की सरकारी खदानें पूरी तरह बंद पड़ी हैं। विभाग ने पहले 42 खदानों के लिए प्रक्रिया शुरू की थी, जिसमें से 31 को ही अनुमति मिली। बार-बार निविदा निरस्त होने से विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। पिछला ठेका शर्मा एसोसिएट्स ने 16 करोड़ 77 लाख रुपए में लिया था, जिसे अक्टूबर 2025 में सरेंडर कर दिया गया था।
अवैध उत्खनन के खेल से माफिया हो रहे मालामाल
एक साल से सरकारी खदानें आधिकारिक रूप से बंद हैं, लेकिन बाजार में रेत की कोई कमी नहीं है। हर रोज सैकड़ों ट्रक रेत खुलेआम बाजारों में बिक रही है। सूत्रों के अनुसार जिले में अवैध उत्खनन का खेल बड़े पैमाने पर चल रहा है, जिसे स्थानीय स्तर पर संरक्षण प्राप्त है। यह कारोबार अधिकारियों और रेत माफिया की मिलीभगत के बिना संभव नहीं है। प्रशासनिक अधिकारी केवल छोटी कार्रवाई करके अपना बचाव करते हैं। अब विभाग पूरी जिले की खदानों को एक ही ग्रुप में रखकर फिर से टेंडर करने की योजना बना रहा है।
सीमित उत्पादन से व्यापार अब घाटे का सौदा
नियमों की सख्ती और सीमित उत्पादन क्षमता के कारण विभाग को अपेक्षित लाभ नहीं मिल रहा है। नए ठेकेदार को केवल 3 लाख 78 हजार घनमीटर रेत निकालने की अनुमति मिलेगी। जबकि पिछला ठेका 5 लाख क्यूबिक मीटर के लिए था। नियमों में किए गए इन बदलावों से पूरा तंत्र अव्यवस्था का शिकार हो गया है। सरकार यदि प्राइज मनी और शर्तों में लचीलापन नहीं लाती है, तो आगामी टेंडर भी विफल हो सकते हैं। खदानों के बंद रहने से जहां एक ओर सरकारी राजस्व डूब रहा है, वहीं दूसरी ओर आम जनता को महंगे दामों पर रेत खरीदने को मजबूर होना पड़ रहा है।
