
जबलपुर। जबलपुर नगर निगम में इन दिनों प्रशासनिक व्यवस्था और नियुक्तियों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सेवानिवृत्त होने के बाद बाजार अधीक्षक के पद से मुक्त हुए दिनेश प्रताप सिंह की दोबारा संविदा पर नियुक्ति ने कई लोगों को हैरान कर दिया है। आश्चर्य की बात यह है कि सेवा में वापसी के बाद वे केवल एक पद तक सीमित नहीं रहे, बल्कि वर्तमान में वे महापौर के सचिव का महत्वपूर्ण दायित्व संभाल रहे हैं। इसके साथ ही वे जोन क्रमांक 2 में कार्य भी देख रहे हैं और निगम के अन्य छोटे बड़े विभागों में भी उनका वर्चस्व कायम है। उनके पास एक साथ इतने पद होने के कारण अन्य विभागों में न तो वे स्वयं मिल पाते हैं और न ही वहां कोई जिम्मेदारी लेने वाला है। उनकी इस सक्रियता और रसूख के कारण आम जनता अपने छोटे छोटे कार्यों के लिए भटकने को मजबूर है। नगर निगम के उच्च अधिकारियों का इस ओर ध्यान न देना और चुप्पी साधे रखना व्यवस्था पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा रहा है।
अनेक पदों पर काबिज अधिकारी और बदहाल व्यवस्था
नगर निगम के विभिन्न विभागों में पदस्थ होने के बावजूद दिनेश प्रताप सिंह की उपस्थिति नदारद रहती है। वे महापौर के सचिव के रूप में कार्य करने का दावा करते हुए अपनी अन्य जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेते हैं। परिणामस्वरूप उन विभागों में काम करवाने पहुंचे आम लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। उन्हें न तो कोई जिम्मेदार व्यक्ति मिलता है और न ही उनका काम समय पर हो पाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी नियुक्ति किसी विशेष कृपा का परिणाम है जिसके चलते वे नियमों को दरकिनार कर अपनी मनमर्जी चला रहे हैं।
धौंस दिखाकर दबाई जा रही अपनी गलतियां
अपनी इस विवादास्पद नियुक्ति और कार्यप्रणाली पर उठने वाले सवालों को दबाने के लिए दिनेश प्रताप सिंह द्वारा तरह तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। वे अक्सर छोटे कर्मचारियों और आम नागरिकों को अपनी धौंस दिखाते हैं ताकि उनकी कारगुजारियों की पोल न खुले। प्रशासनिक संरक्षण मिलने के कारण उनका हौसला इतना बुलंद है कि वे किसी की भी सुनने को तैयार नहीं हैं। नगर निगम प्रशासन की इस उदासीनता का सीधा असर शहर की व्यवस्था पर पड़ रहा है और जनता का आक्रोश बढ़ता जा रहा है।
आखिर प्रशासन की चुप्पी के पीछे क्या है
नगर निगम के उच्च अधिकारी भी इस पूरी स्थिति को देखकर आंखें मूंदे हुए हैं। एक ही व्यक्ति को कई विभागों का प्रभार देना और उसे नियम विरुद्ध तरीके से पद पर बनाए रखना यह स्पष्ट करता है कि कहीं न कहीं बड़े स्तर पर मिलीभगत है। जनता के टैक्स के पैसे से चलने वाले इस संस्थान में जब भ्रष्टाचार और भाई भतीजावाद हावी हो जाता है, तो नुकसान अंततः शहर की आम जनता को ही उठाना पड़ता है। समय आ गया है कि इस मामले की गंभीरता से जांच की जाए और जवाबदेही तय की जाए।
