जबलपुर के 10 बड़े इलाकों में नजूल भूमि की जांच शुरू, हजारों लोगों को भेजे गए नोटिस

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Newzo - News Editor 94 Views
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वर्ष 1953 और 1999 के आवंटन रिकॉर्ड खंगालने में जुटा राजस्व अमला,नामांतरण न होने से सरकारी फाइलों और मौके की स्थिति में बड़ा अंतर

जबलपुर। शहर में नजूल पट्टों के नवीनीकरण और लीज रेंट जमा न होने से शासन को करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान उठाना पड़ रहा है। इस गंभीर लापरवाही को देखते हुए जिला प्रशासन और अपर कलेक्टर न्यायालय ने सख्त रुख अपनाते हुए 14 हजार पट्टाधारियों को एक साथ नोटिस जारी किए हैं। नियमों के मुताबिक वर्ष 1953 और 1999 में आवंटित किए गए इन पट्टों का हर 30 वर्ष में नवीनीकरण कराना अनिवार्य है, लेकिन करीब 70 प्रतिशत आवंटियों ने समय सीमा बीतने के बाद भी यह प्रक्रिया पूरी नहीं की है। वर्तमान में शहर के लगभग 20 हजार से अधिक पट्टाधारियों से वसूली की जानी बाकी है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि लगभग 60 प्रतिशत मामलों में आज तक नामांतरण ही नहीं हुआ है, जिससे मूल पट्टाधारियों की जगह अब उनकी तीसरी पीढ़ी इन जमीनों पर काबिज है, जबकि सरकारी रिकॉर्ड में पुराने नाम ही दर्ज हैं। इस बड़ी विसंगति को सुधारने और फंसे हुए राजस्व को वापस लाने के लिए अब प्रशासन ने सिविल लाइंस, दीक्षितपुरा, रसल चौक, घमापुर, रांझी, हनुमानताल, चेरीताल, नालबंद मोहल्ला, करमचंद चौक और ओमती जैसे प्रमुख इलाकों में बड़े स्तर पर जांच और रिकॉर्ड अपडेट करने का अभियान शुरू किया है।

​दशकों से अटकी लीज रेंट वसूली,अब रिकॉर्ड सुधारने की कवायद शुरू

​राजस्व विभाग की लंबे समय से चली आ रही ढील के कारण शहरी क्षेत्र में सरकारी जमीन का रिकॉर्ड पूरी तरह उलझ गया है। आम तौर पर लोग पट्टों के नवीनीकरण या नामांतरण के लिए तभी दफ्तरों का रुख करते हैं जब उन्हें बैंक से कर्ज लेना हो या फिर संपत्ति का सौदा करना हो। नियमित तौर पर जांच और निगरानी न होने से हजारों लोग बिना किसी वैधानिक रिन्यूअल के ही दशकों से इन जमीनों का उपयोग कर रहे हैं। प्रशासन द्वारा जारी किए गए ताजा नोटिसों का मुख्य उद्देश्य वर्तमान कब्जाधारियों की सही पहचान करना और खसरा रिकॉर्ड को पूरी तरह दुरुस्त करना है। इस पूरी कार्रवाई से जहां एक ओर सरकारी खजाने में बड़ी राशि जमा होगी, वहीं दूसरी ओर भू-अभिलेखों की विसंगतियां भी दूर हो सकेंगी।

​वर्ष 2029 में समाप्त हो रही है दूसरे चरण के आवंटन की मियाद

​जानकारों के अनुसार शहर के विकास और बसाहट को देखते हुए प्रशासनिक स्तर पर वर्ष 1953 में बड़े पैमाने पर नजूल भूमि के पट्टे बांटे गए थे, जिसके बाद वर्ष 1999 में भी ऐसी ही आवंटन प्रक्रिया अपनाई गई थी। नियमों के तहत पट्टे की अवधि समाप्त होने से पहले ही नवीनीकरण की अर्जी देना जरूरी होता है। वर्ष 1999 में स्वीकृत किए गए पट्टों की 30 वर्ष की अवधि अब वर्ष 2029 में पूरी होने जा रही है। इसके बावजूद पट्टाधारियों ने अब तक इसे लेकर कोई गंभीरता नहीं दिखाई है, जिससे आने वाले समय में कानूनी और प्रशासनिक अड़चनें बढ़ना तय माना जा रहा है।

​प्रमुख शहरी क्षेत्रों में पहचान और सत्यापन का काम तेज

​शहर के भीतर खास तौर पर ओमती, करमचंद चौक, नालबंद मोहल्ला, चेरीताल, हनुमानताल, रांझी, घमापुर, रसल चौक, दीक्षितपुरा और सिविल लाइंस ऐसे इलाके हैं जहां नजूल की जमीनें सबसे ज्यादा संख्या में मौजूद हैं। राजस्व अधिकारियों का कहना है कि नोटिस जारी होने के बाद अब भौतिक सत्यापन का पहला चरण शुरू किया जा रहा है। इस प्रक्रिया के दौरान कई ऐसे मामलों का खुलासा होने की उम्मीद है जहां पट्टे की शर्तों का उल्लंघन किया गया है या फिर बिना अनुमति के संपत्तियों के स्वरूप में बदलाव कर दिया गया है। प्रशासन ने सभी नोटिस पाने वालों को तय समय के भीतर जरूरी शुल्क जमा कर अपने दस्तावेज वैध कराने के कड़े निर्देश दिए हैं।

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