आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ की बड़ी कार्रवाई, आवासीय विद्यालय भोजन घोटाले में पूर्व अधिकारी घेरे में

जबलपुर। जबलपुर आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ यानी ईओडब्ल्यू ने भोपाल स्थित शासकीय श्रमोदय आवासीय विद्यालय में मेस संचालन के नाम पर हुए 15549498 रुपये के बड़े वित्तीय घोटाले का पर्दाफाश किया है। इस मामले में जांच एजेंसी ने भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के आरोप में 7 लोगों के खिलाफ नामजद प्राथमिकी दर्ज की है। आरोपियों में विद्यालय के तीन पूर्व प्राचार्य विजय सिंह महोबिया, संतोष सिंह सिसोदिया और वीरेंद्र दुबे शामिल हैं। इनके साथ ही तत्कालीन लेखापाल लीना विश्वकर्मा, कर्मचारी कुलदीप शुक्ला, फर्जी फर्म के संचालक गौरव शर्मा और उनके सहयोगियों को आरोपी बनाया गया है। सरकारी धन को सुनियोजित तरीके से निजी खातों में ट्रांसफर करने के इस मामले में भारतीय न्याय संहिता 2023 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत कार्रवाई शुरू कर दी गई है।
फर्जी फर्म और बैंक खाता बदलकर ऐसे रची गई धोखाधड़ी की पूरी साजिश
इस पूरे घोटाले की शुरुआत साल 2021 में हुई थी जब मध्य प्रदेश भवन एवं अन्य संनिर्माण कर्मकार कल्याण मंडल द्वारा भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर के श्रमोदय विद्यालयों में भोजन व्यवस्था के लिए निविदा जारी की गई थी। भोपाल और इंदौर का ठेका कनक फूड मैनेजमेंट सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड नामक असली कंपनी को मिला था, जिसका आधिकारिक बैंक खाता बैंक ऑफ बड़ौदा की गोवा शाखा में संचालित था। साल 2023 में इस कंपनी के एक सुपरवाइजर गौरव शर्मा ने सरकारी राशि हड़पने की नीयत से एक साजिश रची। उसने मूल कंपनी के नाम से प्राइवेट लिमिटेड शब्द हटाकर कनक फूड मैनेजमेंट सर्विसेज नाम से एक मिलती-जुलती फर्जी फर्म तैयार कर ली। इसके बाद इस फर्जी फर्म का एक नया बैंक खाता इंदौर के एसएमसी फाइनेंस बैंक में खुलवाया गया। साल 2024 में 27 जून को गौरव शर्मा ने एक फर्जी लेटरहेड बनाकर अपने कर्मचारी कुलदीप शुक्ला के माध्यम से स्कूल की अकाउंटेंट लीना विश्वकर्मा को सौंप दिया, जिसमें आगामी सभी भुगतानों को इस नए बैंक खाते में जमा करने का फर्जी निर्देश दिया गया था।
अधिकारियों और तत्कालीन लेखापाल की मिलीभगत से हुआ अवैध भुगतान
जांच में सामने आया है कि इस बड़े घोटाले को अंजाम देने में विद्यालय के जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की सीधी संलिप्तता थी। तत्कालीन अकाउंटेंट लीना विश्वकर्मा ने इतना बड़ा वित्तीय बदलाव करने से पहले अपने वरिष्ठ अधिकारियों से किसी प्रकार की लिखित अनुमति नहीं ली। वह जानबूझकर कार्यालयीन फाइलों और नोटशीट पर तो असली कंपनी का नाम लिखती थी, लेकिन जब भुगतान के लिए चेक काटे जाते थे, तब वह सोची-समझी साजिश के तहत प्राइवेट लिमिटेड शब्द हटा देती थी ताकि पूरा पैसा सीधे फर्जी फर्म के खाते में चला जाए। इस पूरी साजिश का एक बड़ा प्रमाण यह भी मिला है कि बैंक खाता बदलने का औपचारिक पत्र जून 2024 में दिया गया था, जबकि इस फर्जी खाते में पहला अवैध भुगतान अक्टूबर 2023 में ही कर दिया गया था। विद्यालय के पूर्व प्राचार्यों विजय सिंह महोबिया, संतोष सिंह सिसोदिया और वीरेंद्र दुबे ने बिना किसी जमीनी सत्यापन या दस्तावेजों की गहन जांच किए लगातार इन फर्जी देयकों पर हस्ताक्षर किए और सरकारी खजाने से अवैध राशि ट्रांसफर करने की मंजूरी दी।
नए प्राचार्य की सतर्कता से हुआ पर्दाफाश
करोड़ों रुपये के इस घोटाले का खुलासा साल 2025 के फरवरी महीने में हुआ जब विद्यालय में नए प्राचार्य के रूप में प्रदीप राजावत ने कार्यभार संभाला। पदभार ग्रहण करने के बाद जब उनके सामने भुगतान के लिए चेक आया, तो उन्होंने उस पर प्राइवेट लिमिटेड शब्द गायब देखा। उन्होंने सतर्कता बरतते हुए तुरंत 2195000 रुपये के संदिग्ध भुगतान पर रोक लगा दी और मामले की आंतरिक जांच शुरू करवाई। जांच के दौरान यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि मूल कंपनी लगातार स्कूली बच्चों को भोजन उपलब्ध करा रही थी और अपने बकाया भुगतान के लिए कार्यालय के चक्कर काट रही थी, जबकि सरकारी खजाने से लाखों रुपये फर्जी फर्म के बैंक खाते में भेजे जा रहे थे। इसके बाद मामला आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ को सौंपा गया। ईओडब्ल्यू ने प्रारंभिक जांच के बाद भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 61-2, 318-4, 338, 336-3, 340-2 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत मामला दर्ज कर जांच को आगे बढ़ा दिया है।
