
गारंटी में होने के बाद भी ठेकेदार कंपनी पर मेहरबानी, दोगुना हुआ पुल निर्माण का बजट,लोक निर्माण विभाग की कार्रवाई अधूरी, मंत्री के दावों के बाद भी नहीं हुई एफआईआर
जबलपुर। जबलपुर-भोपाल राष्ट्रीय राजमार्ग-45 पर शहपुरा-भिटौनी क्षेत्र में ढहे पुल के पुनर्निर्माण को लेकर अब एक बड़ा प्रशासनिक और वित्तीय सवाल खड़ा हो गया है। इस पूरे मामले में हैरान करने वाली बात यह है कि जिस निर्माण कंपनी को गारंटी पीरियड के नियमों के तहत बिना किसी अतिरिक्त भुगतान के अपने खर्च पर इस पुल को ठीक करके देना था, उसे राहत पहुंचाने के लिए पुल की मूल ड्राइंग और डिजाइन में ही बदलाव कर दिया गया है। नई डिजाइन के आधार पर अब इस पुल का दोबारा निर्माण पियर स्ट्रक्चर पर किया जाएगा, जिस पर सरकारी खजाने से लगभग 20 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान लगाया गया है। इसके विपरीत, अगर पुरानी डिजाइन के अनुसार ही इस कार्य को कराया जाता, तो यह काम मात्र 10 करोड़ रुपए की लागत में पूरा हो सकता था। केंद्रीय टीम यानी सेंट्रल रोड रिसर्च इंस्टीट्यूट की जांच रिपोर्ट आने के बाद इस डिजाइन को बदला गया है। यह पूरा प्रोजेक्ट 391 करोड़ रुपए की भारी-भरकम लागत से अंधमूक बायपास से हिरन नदी पुल के बीच 55 किलोमीटर लंबे मार्ग के विकास के लिए तैयार किया गया था, जिसका निर्माण मेसर्स दिलीप बिल्डकॉन लिमिटेड कंपनी द्वारा किया गया था। यह परियोजना वर्ष 2022 में पूरी हुई थी, इसलिए नियमानुसार यह पुल अभी भी पूरी तरह से गारंटी पीरियड के दायरे में आता था।
दो बार क्षतिग्रस्त हुआ पुल का ढांचा
शहपुरा-भिटौनी क्षेत्र में बने इस पुल का पहला हिस्सा 18 दिसंबर 2025 को अचानक धंस गया था। इसके बाद प्रशासन द्वारा पुल के दूसरे हिस्से से यातायात को डायवर्ट करके संचालित किया जा रहा था, लेकिन लापरवाही का आलम यह रहा कि 22 फरवरी 2026 को पुल का वह दूसरा हिस्सा भी पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। इन दोनों ही हादसों में रेलवे ओवरब्रिज की रिटेनिंग वॉल का हिस्सा क्षतिग्रस्त हुआ था, जो पूरी तरह से पैनल लॉकिंग सिस्टम तकनीक पर आधारित था। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सेंट्रल रोड रिसर्च इंस्टीट्यूट की केंद्रीय टीम ने मौके पर पहुंचकर विस्तृत निरीक्षण किया था। टीम ने अपनी जांच के बाद पियर स्ट्रक्चर पर आधारित एक नई डिजाइन की सिफारिश की, जिसके बाद लोक निर्माण विभाग और संबंधित एजेंसी ने पुराने निर्माण को सुधारने के बजाय पुनर्निर्माण की पूरी योजना को ही बदल दिया। अब इस तकनीकी बदलाव के कारण लगने वाली अतिरिक्त राशि का भार कौन उठाएगा और मूल निर्माण में हुई तकनीकी गड़बड़ी के लिए असल में कौन जिम्मेदार है, इसे लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो सकी है।
कार्रवाई के दावे और ब्लैकलिस्टेड ठेकेदार
पुल ढहने की इस बड़ी घटना के बाद लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह ने सख्त रुख अपनाते हुए दोषी ठेकेदार कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने और लापरवाही बरतने वाले जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की बात कही थी। इसके बावजूद, अब तक किसी भी बड़े अधिकारी के खिलाफ कोई कानूनी मामला या एफआईआर दर्ज नहीं की गई है और न ही इस विषय पर बाद में कोई उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक आयोजित हुई है। हालांकि, घटिया निर्माण, कार्य में गंभीर लापरवाही और निर्धारित प्रोटोकॉल का पालन नहीं करने को लेकर लोक निर्माण विभाग ने एक अन्य कार्रवाई में 5 संभागों के कुल 8 ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट जरूर किया है। ब्लैकलिस्ट होने वाली इन फर्मों में शिवाराध्य कंस्ट्रक्शन, मेसर्स श्री मां कंस्ट्रक्शन, रवींद्र पटेरिया, सरिता कंस्ट्रक्शन, सुरेंद्र प्रसाद ओझा, अरुण कंस्ट्रक्शन, मैहर सीमेंट और आराध्या कंस्ट्रक्शन के नाम शामिल हैं। इसके साथ ही डिंडोरी जिले के एक अलग मामले में एपी ओझा नामक व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराई गई है, लेकिन वर्तमान पुल हादसे में अब तक सख्त प्रशासनिक और कानूनी कदम अधूरे ही दिखाई दे रहे हैं।
तकनीकी बदलाव और आधिकारिक पक्ष
इस पूरे मामले में मध्य प्रदेश सड़क विकास निगम के अधिकारियों का कहना है कि पुल के दोबारा निर्माण को सुरक्षित बनाने के लिए ही तकनीकी बदलाव किए गए हैं। एमपीआरडीसी के एजीएम राकेश मोर ने इस संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि सेंट्रल रोड रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्पष्ट अनुशंसा और तकनीकी रिपोर्ट के आधार पर ही पुल की डिजाइन में आवश्यक बदलाव किया गया है। नए पियर स्ट्रक्चर आधारित निर्माण कार्य पर लगभग 20 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है और इसके लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट यानी डीपीआर तैयार की जा रही है। इस तकनीकी बदलाव के बाद अब नए सिरे से निर्माण की प्रक्रिया शुरू की जाएगी, ताकि भविष्य में इस प्रकार की दुर्घटनाओं को रोका जा सके और राष्ट्रीय राजमार्ग पर यातायात को पूरी तरह सुरक्षित और सुचारू बनाया जा सके।
