Midnight ब्रेकिंग: बहुचर्चित ट्विशा शर्मा केस:आरोपी सास की अग्रिम जमानत मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से निरस्त, आधी रात को जारी हुआ आदेश

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Newzo - News Editor 60 Views
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भोपाल की कटारा हिल्स पुलिस और दिल्ली सीबीआई की जांच के घेरे में आई मृतका की सास को हाईकोर्ट से लगा बड़ा झटका, हिरासत में लेकर पूछताछ की तैयारी

जबलपुर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की जबलपुर पीठ के माननीय न्यायमूर्ति देवनारायण मिश्रा ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी फैसला सुनाते हुए भोपाल के कटारा हिल्स थाने और दिल्ली सीबीआई में दर्ज दहेज प्रताड़ना और संदिग्ध मौत के मामले में मुख्य आरोपी सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी गिरीबाला सिंह की अग्रिम जमानत को पूरी तरह से निरस्त कर दिया है। नौ दिसंबर 2025 को मृतका त्विशा शर्मा का विवाह आरोपी के बेटे समर्थ सिंह के साथ संपूर्ण हिंदू रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुआ था। विवाह के महज पांच महीने के भीतर, बारह मई 2026 को संदेहास्पद परिस्थितियों में फांसी लगने के कारण त्विशा की जान चली गई。 इस दुखद घटना के बाद मृतका के पिता नवनिधि शर्मा और सरकारी जांच एजेंसी ने भोपाल की सत्र अदालत के उस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसके तहत पंद्रह मई 2026 को आरोपी सास को अग्रिम जमानत का लाभ दिया गया था。 उच्च न्यायालय ने मामले की संवेदनशीलता, मृतका के शरीर पर पाई गई चोटों और अग्रिम जमानत मिलने के बाद आरोपी द्वारा जांच में सहयोग न करने के रवैये को आधार बनाकर निचली अदालत के फैसले को गंभीर रूप से दोषपूर्ण माना और उसे खारिज कर दिया。 वर्तमान में दिल्ली पुलिस स्थापना और सीबीआई की विशेष टीम इस पूरे घटनाक्रम की जांच कर रही है。 न्यायालय में राज्य सरकार की तरफ से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह, अतिरिक्त महाधिवक्ता हरप्रीत सिंह रूपराह और सरकारी अधिवक्ता एलएस बघेल ने पैरवी की सीबीआई का पक्ष उप सॉलिसिटर जनरल सुयश मोहन गुरु, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सुनील जैन और टीम ने रखा, जबकि मृतका के पिता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा और अधिवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने दलीलें दीं。 आरोपी पक्ष का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ अधिवक्ता नित्या रामकृष्णन और अधिवक्ता एनोष जॉर्ज कार्लो ने किया।

​शादी के पांच महीने के भीतर संदेहास्पद मौत और प्रताड़ना के आरोप

​अदालत के समक्ष पेश किए गए दस्तावेजी साक्ष्यों के अनुसार विवाह के बाद से ही मृतका को उसके पति समर्थ सिंह और सास गिरीबाला सिंह द्वारा लगातार शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा था。 गवाहों के बयानों और महत्वपूर्ण वॉट्सऐप चैट से यह साफ उजागर हुआ है कि आरोपी पक्ष मृतका के चरित्र पर बेबुनियाद संदेह करता था और उस पर गर्भपात कराने का लगातार दबाव बना रहा था。 इस गंभीर प्रताड़ना से बुरी तरह परेशान होकर मृतका कुछ समय के लिए नोएडा और राजस्थान भी गई थी。 मृतका ने अपने माता-पिता को भेजे संदेशों में साफ लिखा था कि ससुराल वाले उसे न तो चैन से रहने दे रहे हैं और न ही रोने दे रहे हैं, तथा उसके पिता से लगातार मायके से पैसों की मांग की जा रही है。 बारह मई 2026 की रात को अंतिम फोन कॉल कटने के तुरंत बाद त्विशा का शव घर के भीतर संदिग्ध रूप से फंदे से लटका हुआ पाया गया।

​पोस्टमार्टम रिपोर्ट में चोटों का खुलासा और सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका

​एम्स भोपाल में किए गए पोस्टमार्टम की विस्तृत रिपोर्ट ने मामले को और गंभीर बना दिया, क्योंकि मृतका के शरीर पर फांसी के फंदे के अलावा छह अन्य गंभीर चोटें पाई गईं, जो मौत से ठीक पहले किसी भारी वस्तु या बल प्रयोग के कारण लगी थीं。 डॉक्टरों की आधिकारिक तकनीकी रिपोर्ट के अनुसार ये चोटें बाएं हाथ, उंगली और सिर पर थीं, जिन्हें शव को फंदे से नीचे उतारने या अस्पताल ले जाने के दौरान लगना मुमकिन ही नहीं था。 अभियोजन पक्ष ने न्यायालय में पुरजोर दलील दी कि आरोपी ने साइबर अपराध, डिजिटल सिग्नेचर और क्राइम सीन मैनेजमेंट के अपने पुराने अनुभवों का गलत इस्तेमाल करके घटना स्थल के सीसीटीवी फुटेज और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की है。 इसके साथ ही आरोपी ने सोशल मीडिया पर चुनिंदा वीडियो क्लिप लीक करके जांच को प्रभावित करने और मृतका की छवि को खराब करने की कोशिश की।

​हाईकोर्ट द्वारा निचली अदालत के फैसले को अनुचित मानने के मुख्य आधार

​उच्च न्यायालय ने अपने अंतिम आदेश में बेहद सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि निचली अदालत ने केस डायरी में उपलब्ध बेहद महत्वपूर्ण साक्ष्यों और गवाहों के बयानों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया था。 विवाह के महज पांच महीने के भीतर हुई इस संदिग्ध मौत के मामले में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 के तहत मिलने वाली कानूनी उपधारणा पर भी विचार नहीं किया गया。 कोर्ट ने इस बात को रेखांकित किया कि आरोपी एक प्रभावशाली और पूर्व न्यायिक अधिकारी हैं, जिन्होंने अग्रिम जमानत का सुरक्षा कवच मिलने के बाद जांच एजेंसियों द्वारा जारी किए गए कई कानूनी नोटिसों की अवहेलना की और बयान दर्ज कराने नहीं आईं。 ऐसे गंभीर और जघन्य अपराध की निष्पक्ष व स्वतंत्र जांच को अंजाम देने के लिए आरोपी को हिरासत में लेकर पूछताछ करना बेहद आवश्यक है, जिसके चलते अग्रिम जमानत का आदेश तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाता है।

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