
शशिकांत ओझा,मुख्य जनसंपर्क अधिकारी, पावर ट्रांसमिशन कम्पनी,जबलपुर
आजकल बागवानी, फार्म हाउस, रिसॉर्ट परिसरों में सब्जी उत्पादन तथा छोटे-छोटे भूमि टुकड़ों पर शौकिया सब्जी उगाने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। कई लोग रिटायरमेंट के बाद गांवों में थोड़ी जमीन लेकर समय बिताने, प्रकृति से जुड़ने या कुछ अतिरिक्त आय के उद्देश्य से सब्जियां उगाने लगे हैं। यह प्रवृत्ति व्यक्तिगत स्तर पर सकारात्मक और प्रेरणादायक दिखाई देती है, लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी है, जिस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है । सुबह किसी भी थोक सब्जी मंडी में जाइए। वहां आपको ऐसे सैकड़ों छोटे किसान मिलेंगे, जो साइकिल, ठेले या सिर पर टोकरी रखकर अपनी मेहनत की उपज बेचने आते हैं। दिनभर की कड़ी मेहनत, बढ़ती लागत, महंगे बीज, खाद, कीटनाशक और सिंचाई खर्च के बावजूद कई बार उन्हें अपनी सब्जियों का इतना भी मूल्य नहीं मिल पाता कि उत्पादन लागत निकल सके। उनके चेहरों पर निराशा और चिंता साफ दिखाई देती है।
छोटे किसानों, स्थानीय व्यापारियों और थोक विक्रेताओं से बातचीत करने पर अक्सर यह बात सामने आती है कि फार्म हाउस, रिसॉर्ट, शौकिया खेती करने वाले लोगों तथा रिटायरमेंट के बाद सीमित भूमि पर सब्जियां उगाने वाले नए उत्पादकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इनमें से कई लोग खेती को मुख्य व्यवसाय के रूप में नहीं करते, इसलिए वे लागत और लाभ के पारंपरिक गणित से उतने बंधे नहीं होते। कई बार उनकी उपज स्थानीय बाजार में पहुंचने से अचानक आपूर्ति बढ़ जाती है, जिससे कीमतों में गिरावट आती है और बाजार में अस्थिरता पैदा होती है।
निश्चित रूप से किसी को खेती करने से रोकना न तो उचित है और न ही संभव।
खेती से जुड़ाव समाज और पर्यावरण दोनों के लिए लाभकारी हो सकता है। लेकिन जब बड़ी संख्या में गैर-व्यावसायिक या शौकिया उत्पादक बाजार में प्रवेश करते हैं, तब इसका प्रभाव उन किसानों पर पड़ता है जिनकी पूरी आजीविका सब्जी उत्पादन पर निर्भर है। मूल्य गिरने का सबसे बड़ा आघात उसी छोटे किसान को झेलना पड़ता है, जिसके परिवार का भरण-पोषण इसी आय से होता है। समाज को यह समझने की जरुरत है कि खेती केवल शौक या मनोरंजन का विषय नहीं है, बल्कि लाखों परिवारों के जीवन का आधार है। उत्पादन, विपणन और बाजार व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। यदि इस विषय पर समय रहते गंभीर चर्चा नहीं हुई, तो संभव है कि प्रकृति प्रेम, फार्म हाउस संस्कृति और शौकिया खेती के बढ़ते आकर्षण के बीच उन छोटे किसानों की आर्थिक स्थिति और कमजोर हो जाए, जिनकी मेहनत से हमारी थाली तक ताजी सब्जियां पहुंचती हैं। यह केवल बाजार का प्रश्न नहीं है, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता, कृषि अर्थव्यवस्था के संतुलन और ग्रामीण आजीविका की सुरक्षा का भी विषय है, जिस पर व्यापक और गंभीर विमर्श की आवश्यकता है।
