बिना सबूत ‘फायर’ करना पड़ा महंगा, संजय पाठक के दावों की अब कोर्ट करेगा जांच

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Newzo - News Editor 3 Views
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भाजपा विधायक की कानूनी डगर हुई कठिन, हाईकोर्ट ने खटखटाया सरकार का दरवाजा

जबलपुर। मध्य प्रदेश के कटनी जिले के अंतर्गत आने वाले विजयराघवगढ़ क्षेत्र के भारतीय जनता पार्टी के विधायक संजय पाठक एक बार फिर न्यायिक फेरबदल के केंद्र में हैं। जबलपुर स्थित उच्च न्यायालय ने कटनी निवासी शस्त्र व्यवसायी नाजिम खान की ओर से प्रस्तुत मानहानि अर्जी पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए प्रदेश सरकार को नोटिस थमाया है, जिसका उत्तर 2 सप्ताह के भीतर सौंपना होगा। जस्टिस प्रमोद कुमार अग्रवाल की एकल पीठ ने शुक्रवार को इस मामले का संज्ञान लेते हुए आगामी सुनवाई हेतु 6 जुलाई की तिथि निर्धारित कर दी है। फरियादी का मुख्य आक्षेप है कि जनप्रतिकात्मक पद पर बैठे विधायक ने खुलेआम उन पर मिथ्या और द्वेषपूर्ण लांछन लगाए, जिससे उनके मान-सम्मान को ठेस पहुंची है। स्थानीय स्तर पर सुनवाई न होने पर उन्होंने न्यायालय की चौखट छुई।

​मंच से लगे आरोपों ने शस्त्र व्यवसायी की साख को पहुंचाई क्षति

​न्यायालयीन कार्यवाही के दौरान शिकायतकर्ता नाजिम खान के विधिक सलाहकार ने स्पष्ट किया कि विधायक संजय पाठक द्वारा सार्वजनिक रूप से दिए गए वक्तव्य पूरी तरह से कपोल-कल्पित और सत्य से परे हैं। प्रस्तुत दस्तावेज में उन सभी भाषणों का प्रामाणिक विवरण जोड़ा गया है, जिनमें विधायक ने सरेआम यह बात कही थी कि इस वेपन डीलर के गोदाम से 14000 राउंड गोलियां नदारद हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, माननीय ने उन पर गैर-कानूनी तरीके से हथियारों की दलाली और तस्करी करने के लांछन भी जड़ दिए थे। इन आरोपों को पूरी तरह मनगढ़ंत करार देते हुए व्यवसायी ने दलील दी कि इससे उनके बरसों पुराने व्यापारिक नेटवर्क और साख को भारी आघात लगा है।

​ पुलिस में सुनवाई न होने से क्षुब्ध फरियादी ने लिया कानून का सहारा

​इस कानूनी जंग में नया मोड़ तब देखने को मिला जब पीड़ित पक्ष ने पीठ के समक्ष यह खुलासा किया कि बयानों के तुरंत बाद कटनी के पुलिस महकमे को बाकायदा लिखित शिकायत देकर दंडात्मक कार्रवाई का आग्रह किया गया था। जब पुलिसिया तंत्र ने रसूखदार जनप्रतिनिधि के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया, तब विवश होकर न्याय की आस में सीधे उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा। ध्यान देने योग्य तथ्य यह भी है कि इस प्रकरण की पूर्व सुनवाई से जस्टिस विशाल मिश्रा ने स्वयं को विलग कर लिया था, जिसके बाद यह फाइल जस्टिस प्रमोद कुमार अग्रवाल को आवंटित की गई। अब इस न्यायिक हस्तक्षेप के बाद शासन को निर्धारित अवधि में अपना रुख साफ करना होगा।

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