
कलेक्टर की सख्ती से डिंडौरी स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप
डिंडौरी। जिला अस्पताल में एक अजीबोगरीब मामला सामने आया जहां एक मरीज को सलाइन के बजाय मिनरल वाटर चढ़ाने की चर्चा ने तूल पकड़ लिया। इस मामले में कलेक्टर अंजू पवन भदौरिया ने सख्त कदम उठाते हुए सीएमएचओ डॉ मनोज पांडेय सिविल सर्जन डॉ मरावी और ड्यूटी डॉक्टर भरत संत को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। इन सभी अधिकारियों को 3 अगस्त तक अपना जवाब देने के लिए कहा गया है। दूसरी तरफ इस लापरवाही पर कार्रवाई करते हुए नर्स भावना चौधरी को निलंबित कर दिया गया है। कलेक्टर का कहना है कि इलाज के दौरान तय चिकित्सा प्रोटोकॉल का बिल्कुल पालन नहीं किया गया जिसे मेडिकल एक्सपर्ट्स भी गलत मान रहे हैं। हालांकि पहली बार मीडिया के सामने आए ड्यूटी डॉक्टर ने सफाई देते हुए कहा कि मिनरल वाटर की ड्रिप नहीं चढ़ाई गई थी बल्कि गैस्ट्रिक लैवेज प्रक्रिया के तहत नाक के जरिए पानी डालकर पेट साफ किया गया था। गनीमत यह रही कि मरीज अब पूरी तरह स्वस्थ है और अस्पताल से डिस्चार्ज होकर अपने घर जा चुका है लेकिन प्रशासनिक स्तर पर हुई इस हलचल ने स्वास्थ्य व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
डिंडौरी अस्पताल में इलाज के नाम पर गंभीर लापरवाही
डियूटी डॉक्टर की सफाई के बावजूद जिला प्रशासन ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया है। कलेक्टर अंजू पवन भदौरिया ने अस्पताल की व्यवस्थाओं और इलाज के दौरान बरती गई घोर लापरवाही पर कड़ा रुख अपनाया है। कलेक्टर का साफ तौर पर यह मानना है कि अस्पताल परिसर में मरीजों के इलाज के दौरान निर्धारित नियमों और मेडिकल प्रोटोकॉल का पूरी तरह से पालन होना चाहिए। नियमों की अनदेखी करने वाले किसी भी जिम्मेदार शख्स को बख्शा नहीं जाएगा। इसी कड़ी में लापरवाही के दायरे में आने वाले सीएमएचओ डॉ मनोज पांडेय सिविल सर्जन डॉ मरावी और ड्यूटी डॉक्टर भरत संत को नोटिस जारी करके तीन अगस्त तक जवाब तलब किया गया है। इसके अलावा ड्यूटी पर तैनात रही नर्स भावना चौधरी को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया गया है। इस पूरी कार्रवाई से स्वास्थ्य विभाग के महकमे में हड़कंप मच गया है और डॉक्टर तथा अन्य मैदानी अमला अपनी कार्यशैली को लेकर सतर्क हो गया है ताकि भविष्य में इस तरह की चूक दोबारा न दोहराई जा सके।
पेट साफ करने की प्रक्रिया पर उठे कई सवाल
इस पूरे घटनाक्रम के सामने आने के बाद मेडिकल जगत और आम जनता के बीच तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। ड्यूटी डॉक्टर ने मीडिया के सामने आकर अपना पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया कि मिनरल वाटर की कोई भी ड्रिप मरीज के शरीर में नहीं चढाई गई थी। उनके अनुसार वह चिकित्सीय प्रक्रिया गैस्ट्रिक लैवेज का एक हिस्सा थी जिसमें नाक के रास्ते पानी डालकर मरीज का पेट साफ किया जाता है ताकि उसके भीतर मौजूद हानिकारक तत्वों या विषैले पदार्थों को बाहर निकाला जा सके। डॉक्टरों का यह तर्क भले ही अपनी जगह तकनीकी रूप से सही हो सकता है लेकिन आम लोगों के बीच यह खबर फैलने के बाद अस्पताल की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लग गए। राहत की बात यह है कि जिस मरीज को लेकर यह पूरा विवाद खड़ा हुआ था वह अब पूरी तरह से स्वस्थ है और डॉक्टर की सलाह के बाद अपने घर लौट चुका है। इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि अस्पताल प्रशासन को मरीजों के इलाज के दौरान पारदर्शिता और संवाद पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है ताकि किसी भी तरह की गलतफहमी से बचा जा सके।
