
देश में शिक्षा व्यवस्था और परीक्षाओं की पवित्रता आज एक ऐसे दोर से गुजर रही है जहां युवाओं का भविष्य दांव पर लगा है। हाल के वर्षों में राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा यानी नीट (NEET) जैसी महत्वपूर्ण परीक्षाओं में बार-बार सामने आई गड़बड़ियों ने व्यवस्था की पोल खोल दी है। इन हालातों को देखते हुए आज देश का हर नागरिक और पीड़ित छात्र यही मांग कर रहा है कि इस वक्त का सबसे बड़ा तकाजा यह है कि देश का “प्रधान” भी लाल बहादुर शास्त्री जैसा बहादुर बने और कड़े फैसले ले।
नैतिकता और जवाबदेही का ऐतिहासिक उदाहरण
भारतीय राजनीति में उच्च नैतिक मूल्यों का जब भी जिक्र आता है, तो पूर्व प्रधानमंत्री स्व. लाल बहादुर शास्त्री का नाम सबसे पहले लिया जाता है। वर्ष 1956 में महबूबनगर रेल हादसे के बाद, जिसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने रेल मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था, यह साबित किया कि पद से बड़ा जनता का विश्वास और जीवन होता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा उनके इस्तीफे को पहले न स्वीकार किए जाने के बावजूद, जब कुछ महीनों बाद अरियालूर में एक और बड़ी रेल दुर्घटना हुई, तो शास्त्री जी ने बिना किसी संकोच के दोबारा अपना इस्तीफा सौंप दिया।
संसद में अपने संबोधन में उन्होंने स्पष्ट किया था कि वे इस इस्तीफे को एक “नजीर” (मिसाल) के रूप में पेश कर रहे हैं, ताकि भविष्य में व्यवस्था के प्रति जवाबदेही तय हो सके। आज के दौर में जब पिछले कुछ वर्षों में नीट परीक्षा में कई बार धांधलियां और प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाएं सामने आई हैं, तो इस ऐतिहासिक नैतिकता की भारी कमी साफ महसूस होती है।
परीक्षा की विसंगतियां और नेतृत्व की चुप्पी
पिछले पांच वर्षों में नीट परीक्षा प्रणाली की साख को बार-बार ठेस पहुंची है। देश के लाखों मेधावी छात्र रात-दिन मेहनत कर अपनी तैयारी करते हैं, लेकिन सिस्टम की लापरवाही और भ्रष्टाचार के कारण उनका भविष्य अंधकारमय हो जाता है।
- सिस्टम में सुधार की विफलता: इतनी बड़ी प्रशासनिक विफलता के बावजूद जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों द्वारा पूरी व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
- नैतिक जिम्मेदारी से किनारा: शास्त्री जी की तरह नैतिकता के आधार पर खुद आगे आकर पद छोड़ने की परंपरा अब विलुप्त होती दिख रही है।
- संवादहीनता: देश के माननीय प्रधानमंत्री हर परीक्षा से पहले “मन की बात” कार्यक्रम के जरिए बच्चों से संवाद करते हैं, उन्हें दिलासा देते हैं। लेकिन बार-बार नीट जैसी गंभीर समस्याएं सामने आने के बावजूद छात्रों से इस विषय पर सीधी बात क्यों नहीं की गई? क्या इन युवाओं को यह भरोसा दिलाना जरूरी नहीं था कि सरकार उनके साथ खड़ी है और व्यवस्था को पूरी तरह सुधार दिया जाएगा?
छात्रों का भरोसा और उचित न्याय
आज छात्रों और उनके अभिभावकों की मांग कोई असंभव मांग नहीं है। उनका सिर्फ इतना कहना है कि इस गंभीर विफलता की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफा लिया जाना चाहिए था। इसे किसी की जिद या “बाल हठ” मानकर खारिज करने के बजाय, छात्रों के घावों पर मरहम लगाने के रूप में देखा जाना चाहिए था।
यदि आज सरकार और प्रधानमंत्री इस दिशा में सख्त कदम उठाते हैं, तो इससे देश के करोड़ों युवाओं के मन में यह विश्वास जागेगा कि न्याय और ईमानदारी सर्वोपरि है। यह किसी व्यक्ति विशेष की प्रतिष्ठा का विषय नहीं है, बल्कि उस जनता की आवाज है जिसने अपनी सरकार चुनी है।
भविष्य के लिए सख्त संदेश
अभी भी समय है कि नेतृत्व अपनी पारदर्शी कार्यशैली का परिचय दे। प्रधानमंत्री को चाहिए कि वे बच्चों से संवाद करें, पूरी परीक्षा प्रणाली में आमूल-चूल सुधार करें और यह सुनिश्चित करें कि भविष्य में ऐसी पुनरावृत्ति कभी न हो। इस वर्ष जिन दोषियों ने छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया है, उन्हें ऐसी मिसाल कायम करने वाली सजा मिलनी चाहिए ताकि कोई भी व्यक्ति ऐसा अपराध करने से पहले सौ बार सोचे।
सिस्टम की इस लापरवाही के कारण जिन छात्रों ने अपनी अमूल्य जान गंवाई है, उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि तभी मिल सकती है जब दोषियों को उनके अंजाम तक पहुंचाया जाए और पीड़ित माता-पिता के आंसुओं को पोंछते हुए उन्हें आत्मिक शांति दी जाए। जनता की इस पुकार को सकारात्मक रूप में स्वीकार करना ही सच्चे लोकतंत्र और मजबूत नेतृत्व की पहचान है।
