
देश के सभी बड़े राजनीतिक दलों के पास अपने छात्र संगठन और युवा विंग मौजूद हैं, जो कागजों पर मजबूत दिखते हैं। कांग्रेस के पास अपनी पारंपरिक छात्र इकाइयां हैं और भाजपा के पास युवा मोर्चा है, जो चुनाव के समय बूथ स्तर तक सक्रिय रहते हैं। राजनीतिक यथार्थ यह है कि इन युवा संगठनों को नीति-निर्धारक निकाय मानने के बजाय केवल प्रचार और क्रियान्वयन यानी एक्जीक्यूशन टीम मान लिया गया है। टिकट वितरण से लेकर बड़े गठबंधन और नीतियों के निर्धारण तक के सभी महत्वपूर्ण फैसले केवल वरिष्ठ नेताओं के कमरों में बंद होकर लिए जाते हैं। युवा विंग के मंचों पर नए चेहरों को केवल भाषण देने का मौका मिलता है, लेकिन फैसले की मेज पर उन्हें नेतृत्व की कुर्सी नहीं बल्कि तस्वीरों के फ्रेम मिलते हैं। यही कारण है कि आज की युवा पीढ़ी यह महसूस कर रही है कि राजनीति में उन्हें केवल एक शोपीस की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।
बदलते दौर में नई पीढ़ी के तेवर
नई पीढ़ी के राजनीति को देखने और समझने का तरीका पूरी तरह बदल चुका है। आज का युवा केवल वादों वाले भाषणों और लंबे घोषणापत्रों से संतुष्ट नहीं होता है, बल्कि वह सोशल मीडिया पर तुरंत फैक्ट चेक करता है और नेताओं से सीधे तीखे सवाल पूछता है। उसके लिए राजनीति अब केवल जाति या धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रोजगार, शिक्षा, पारदर्शिता, भ्रष्टाचार पर रोक और संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता जैसे गंभीर मुद्दों का संगम बन चुकी है। यदि राजनीतिक दल लंबे समय तक अपनी प्रासंगिकता बचाए रखना चाहते हैं, तो उन्हें अपने संगठनात्मक ढांचे में बदलाव करना होगा। पार्टियों को अपने संविधान में यह स्पष्ट प्रावधान करना चाहिए कि 35 साल से कम उम्र के युवाओं को जिला से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के पदों पर निश्चित हिस्सेदारी दी जाए और उन्हें मुख्य निर्णय समितियों का सदस्य बनाया जाए।
नजरअंदाज करने पर भुगतना होगा राजनीतिक खामियाजा
यदि राजनीतिक दल इस बदलाव को समय रहते स्वीकार नहीं करते हैं और टिकटों में युवाओं को वास्तविक हिस्सेदारी नहीं देते हैं, तो उन्हें इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। नई पीढ़ी धीरे-धीरे मुख्यधारा के दलों से दूरी बनाकर वैकल्पिक आंदोलनों और स्वतंत्र उम्मीदवारों की ओर रुख कर सकती है। जो डिजिटल पीढ़ी सोशल मीडिया पर नैरेटिव गढ़ने की अद्भुत क्षमता रखती है, वह उपेक्षित किए जाने पर किसी भी बड़े दल के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है। इसलिए यह समय आ गया है कि राजनीति में जेन-जी को केवल दर्शक या प्रचारक नहीं बल्कि मुख्य नेता बनाया जाए। जो दल इस सच्चाई को जितनी जल्दी समझ लेगा, भविष्य की सत्ता के समीकरणों पर उसी की पकड़ मजबूत होगी, अन्यथा यह नई पीढ़ी पुराने दलों को इतिहास की फाइलों में धकेलने से बिल्कुल नहीं हिचकिचाएगी।
