
जबलपुर। जबलपुर प्रवास के दौरान रविवार को शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने देश की वर्तमान सियासत, युवाओं के देशव्यापी प्रदर्शन और निर्वाचन प्रणाली पर खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने खुद को चाणक्य और तीसमार खां समझने वाले हुक्मरानों को आगाह करते हुए कहा कि निष्कपट विद्यार्थियों से बैर मोल लेना सत्ता को भारी पड़ेगा। उन्होंने रेखांकित किया कि जिस हुकूमत का घमंड था कि वहां त्यागपत्र की कोई परंपरा नहीं है, उसी व्यवस्था को नई पौध के दबाव ने पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। पुराने घाघ सियासतदानों के मुकाबले इन युवाओं ने अपनी ताकत साबित कर दी है। उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के वास्ते मुख्य चुनाव आयुक्त को तत्काल बर्खास्त करने और युवाओं की जायज मांगों को बिना किसी देरी के मंजूर करने की जोरदार मांग उठाई।
निर्दोष विद्यार्थियों की वास्तविक पीड़ा तुरंत समझे शासन
शंकराचार्य ने समझाया कि जिस तरह पैर में चुभे कांटे की टीस से छोटा बच्चा चीख पड़ता है, ठीक वैसे ही इस समय जेन-जी पीढ़ी अपनी वास्तविक व्यथा प्रकट कर रही है। हुकूमत को चाहिए कि वह इस बेचैनी को ज्यादा वक्त तक सड़कों पर न फैलने दे, वरना यह असंतोष भविष्य में एक व्यापक बगावत बन सकता है। जब सत्ता निर्मल मन वाले नौजवानों के सामने अड़ती है, तो उसकी सारी चालाकियां और कूटनीतियां नाकाम साबित हो जाती हैं। इसलिए बच्चों को प्रताड़ित करने और दबाने का रास्ता छोड़ना ही भलाई का काम होगा।
छात्र राजनीति की पाबंदी और चुनाव आयोग में दरार
महाविद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में छात्र संघ के चुनाव निलंबित होने से युवाओं का मुख्यधारा की राजनीति में प्रवेश रुक गया था। यह प्रदर्शन 1974 के जयप्रकाश नारायण आंदोलन जैसा है, जहां शुरुआत में कोई सत्ता में नहीं था, पर आगे चलकर उसी दौर ने देश को नए हुक्मरान दिए। यदि वर्तमान आक्रोश को दबाने की चेष्टा हुई, तो वहां से अचानक सैकड़ों नए नेता उभरकर गद्दी बदल देंगे। इसी के साथ उन्होंने निर्वाचन सदन पर सवाल उठाते हुए कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त और उनके 2 सहयोगियों के बीच 1 वर्ष से गंभीर मुद्दों पर मतभेद चल रहे थे, जिनकी सुनवाई नहीं हुई। ऐसे में चुनावी विश्वसनीयता बचाने के लिए मौजूदा प्रमुख को हटाकर पारदर्शी व्यवस्था से नई नियुक्ति करनी चाहिए।
