
✍️ जस्टिस डॉ. अनिल वर्मा
मेरे लिए सदैव यह जिज्ञासा और दिलचस्पी का विषय रहा है कि आज से ठीक 100 वर्ष पहले क्या हुआ था? इतिहास के पन्नों में दर्ज घटनाएं हमें यह एहसास कराती हैं कि जिन स्थानों, शहरों और रास्तों से हम आज गुजरते हैं, वे अपने भीतर कितनी अनकही कहानियां समेटे हुए हैं. समय के साथ घटनाएं बीत जाती हैं, पीढ़ियां बदल जाती हैं और उनके निशान भी धीरे-धीरे धुंधले पड़ जाते हैं. लेकिन इतिहास के पन्नों में दर्ज कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं, जो एक सदी बाद भी हमें ठहरकर अतीत की ओर देखने के लिए मजबूर कर देती हैं.आज मैं आपको हमारे1926 आसपास घटित ऐसी ही एक शताब्दी पुरानी ऐतिहासिक घटना के बारे में बताता हूं. इतिहास के पन्नो में यह दास्तां दर्ज है कि 20 सितंबर 1926 को जबलपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों में रिकॉर्ड तोड़ वर्षा हुई थी और महज़ 24 घंटे के दौरान ही लगभग 8.5 इंच वर्षा दर्ज की गई. इस अभूतपूर्व बारिश के कारण नर्मदा नदी उफान पर आ गई और भीषण बाढ़ ने आसपास के क्षेत्रों में भारी तबाही मचाई थी. मां नर्मदा के इसी विकराल रूप का सबसे बड़ा असर रेल यातायात पर पड़ा और 21 सितंबर 1926 को जबलपुर और इटारसी रेलखंड के बीच नर्मदा नदी पर बना महत्वपूर्ण रेल पुल बाढ़ के तेज बहाव में बहकर पूरी तरह धाराशाही हो गया था.चलिए, अब उस ऐतिहासिक पुल का इतिहास देखते है. वह पुल ‘ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे’ (GIPR) के इटारसी-जबलपुर सेक्शन पर सन 1863-66 के दौरान निर्मित गया था और साल 1870 में इसे रेल यातायात के लिए खोला गया था. यह पुल अपनी इंजीनियरिंग और संरचना के कारण उस दौर की एक महत्वपूर्ण रेलवे उपलब्धि माना जाता था. यह बताया जाता है कि इस पुल में 150-150 फीट के पांच स्पैन थे और दोनों ओर तीन-तीन चिनाई वाले आर्च बनाए गए थे. कई दशकों तक यह पुल मध्य भारत के महत्वपूर्ण रेल संपर्क का प्रमुख माध्यम बना रहा. लेकिन सितंबर 1926 की वह भयावह बाढ़ इतनी शक्तिशाली थी कि यह मजबूत रेल पुल भी नर्मदा के प्रचंड प्रवाह का सामना नहीं कर सका. उस समय की सबसे प्रसिद्ध और तेज रेलगाड़ियों में शामिल ‘इंपीरियल इंडियन मेल’, जो मुंबई और कोलकाता के बीच चलती थी, इस पुल के टूट जाने के कारण प्रभावित हुई और ट्रेन को भोपाल, बीना और कटनी के रास्ते लंबे वैकल्पिक मार्ग से मार्ग से डाइवर्ट करना पड़ा था. यह खूबसूरत और आरामदेह ट्रेन ब्रिटिश शासन के अधिकारियों तथा विशिष्ट यात्रियों के बीच विशेष रूप से लोकप्रिय थी. अतः पुल के नष्ट होने से केवल स्थानीय रेल यातायात ही प्रभावित नहीं हुआ, बल्कि देश के दो महत्वपूर्ण महानगरों के बीच रेल संपर्क पर भी गंभीर असर पड़ा था.हालांकि रेलवे प्रशासन पहले से ही 1927-29 के दौरान इस पुल को एक नए एलाइनमेंट पर बनाने की योजना बना रहा था, लेकिन इसके पहले ही प्रकृति ने अपना रौद्र रूप दिखा दिया था. पुल टूटने के बाद रेल यातायात को शीघ्र बहाल करने के लिए एक अस्थायी ‘सिंगल ट्रैक ट्रेस्टल ब्रिज’ का निर्माण किया गया जब तक यह व्यवस्था पूरी नहीं हुई, तब तक रेल यातायात गंभीर रूप से प्रभावित रहा. अंततः 31 मई 1928 को नया पुल पूरी तरह चालू होने के बाद ट्रेनों का संचालन पुनः जबलपुर के मार्ग से शुरू हो सका. बाद के वर्षों में टाटा कंस्ट्रक्शन कंपनी की मदद से इस पुल का स्थायी और पूर्ण पुनर्निर्माण किया गया था.अब सबसे बड़ा और रोचक प्रश्न यही है कि 1931 में निर्मित वह पुल आज भी अस्तित्व में है या नहीं? यदि है, तो क्या वह आज भी उस विनाशकारी बाढ़ और उसके बाद हुए पुनर्निर्माण की मूक कहानी अपने भीतर समेटे हुए है? और यदि नहीं, तो उसके इतिहास और अवशेषों का दस्तावेजी रिकॉर्ड कहां सुरक्षित है? इन प्रश्नों का प्रमाणिक उत्तर निश्चित रूप से पश्चिम मध्य रेलवे प्रशासन और रेलवे के ऐतिहासिक अभिलेख ही दे सकते हैं. लेकिन इतना तो निश्चित है कि इतिहास केवल बीती हुई तारीखों और घटनाओं का संग्रह नहीं होता. इतिहास हमारे आसपास ही सांस लेता है—कभी किसी पुराने पुल में, कभी किसी रेलवे लाइन में और कभी किसी नदी की शांत दिखने वाली धाराओं के भीतर.आज, उस घटना को पूरे 100 वर्ष बीत चुके हैं. एक सदी के दौरान न जाने कितनी पीढ़ियां बदल गईं, रेल यात्राएं बदल गईं, तकनीक बदल गई और नर्मदा पर बने पुलों का स्वरूप भी बदलता गया. लेकिन सितंबर 1926 की वह भीषण बाढ़ आज भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है—एक ऐसी प्राकृतिक आपदा के रूप में, जिसने नर्मदा की अपार शक्ति और मानव निर्मित संरचनाओं की सीमाओं को एक साथ उजागर कर दिया था।
