जल जंगल जमीन और रोजगार को लेकर फूटा ग्रामीणों का गुस्सा

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Newzo - News Editor 44 Views
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मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपकर ग्रामीणों ने घेरा कलेक्ट्रेट परिसर

डिंडौरी। डिंडोरी जिले में जन संगठनों और ग्रामीणों ने एकजुट होकर अपनी लंबित समस्याओं के समाधान के लिए सड़कों पर उतरते हुए जोरदार रैली निकाली और कलेक्ट्रेट पहुंचकर मुख्यमंत्री के नाम कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा। इस प्रदर्शन में प्रमुख रूप से हटाए गए रसोई मित्र, पेसा मोबाइलाइजर, संविदा प्रेरक शिक्षक, किसान मित्र, किसान दीदी, आउटसोर्स लाइनमैन, सांझा चूल्हा रसोइया, मनरेगा मेट और स्व-सहायता समूह की महिलाओं के रोजगार, मानदेय और अधिकारों का प्रश्न जोर-शोर से उठाया गया। प्रदर्शनकारियों ने प्रशासनिक व्यवस्था पर उपेक्षा का आरोप लगाते हुए जिले और सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रस्तावित बांध परियोजनाओं पर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराईं। उन्होंने ग्रामसभाओं की पूर्व सहमति के बिना चल रहे कार्यों को तत्काल रोकने, वनाधिकार दावों का निस्तारण करने और हक की लड़ाई लड़ रहे स्थानीय पंचायत प्रतिनिधियों पर दर्ज मामलों को वापस लेने की मांग रखी। आंदोलनकारियों ने चेतावनी दी कि यदि शासन स्तर से इन मांगों पर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दिनों में यह संघर्ष और व्यापक रूप लेगा।

​कर्मचारियों के सम्मानजनक मानदेय बहाली पर कड़ा रुख

​प्रदर्शनकारियों ने ज्ञापन में स्पष्ट कहा कि शासकीय और अर्ध-शासकीय व्यवस्था में काम कर रहे मैदानी अमले की सेवाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। पूर्व में हटाए गए कर्मियों को बिना शर्त तत्काल प्रभाव से काम पर लौटाया जाए। विभिन्न संवर्गों में सेवा दे रहे कर्मियों को समान कार्य के बदले समान वेतन दिया जाए, जिससे उनका आर्थिक शोषण रुके। मध्याह्न भोजन योजना के अंतर्गत लंबित बिलों का भुगतान सीधे तौर पर कराया जाए ताकि संचालन बाधित न हो। महिला समूहों से बिना पारिश्रमिक के जबरन कार्य कराने की परिपाटी समाप्त की जाए।

​विवादित बांध योजनाओं पर ग्रामसभा की मंजूरी अनिवार्य

​डिंडोरी तथा नजदीकी सीमावर्ती जिलों में चल रही जल संसाधन परियोजनाओं में नियम विरुद्ध अपनाई गई प्रक्रियाओं को रद्द करने की आवाज उठाई गई। ग्रामीणों का कहना है कि प्रभावित गांवों में औपचारिक सूचना और परामर्श के अभाव में किसी भी तरह की निर्माण गतिविधि शुरू न हो। विकास के नाम पर आदिवासियों और किसानों के संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी बंद होनी चाहिए। इसके साथ ही आंदोलनों में सक्रिय रहे ग्राम पंचायत प्रतिनिधियों और ग्रामीण प्रमुखों पर प्रशासनिक दबाव बनाने के उद्देश्य से लगाए गए सभी कानूनी प्रतिबंध तथा दर्ज प्रकरण फौरन खत्म किए जाएं।

​पेसा कानून का कड़ाई से पालन सुनिश्चित हो

​वनाधिकार कानून तथा पेसा प्रावधानों को कागजों से बाहर निकालकर जमीनी स्तर पर पूरी सख्ती से लागू करने की मांग की गई। वन क्षेत्र से सटे खेतों में वन महकमे द्वारा फसल चराई की आड़ में होने वाले नुकसान पर पुलिस स्तर से ठोस कार्रवाई दर्ज हो। लंबित पड़े सभी वन अधिकार पट्टों और दावों का निपटारा पूरी पारदर्शिता के साथ 3 महीने की निश्चित समय-सीमा में किया जाए। किसी भी सरकारी योजना में हितग्राहियों के चयन, विकास कार्य और राशि आबंटन में ग्रामसभा के फैसलों को सर्वोपरि मानते हुए पंचायतों को पूर्ण स्वायत्तता प्रदान की जाए।

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