हाई कोर्ट पहुंचा राज्यपाल की कुर्सी का मामला, युगलपीठ में बहस

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Newzo - News Editor 58 Views
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जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की युगलपीठ ने राज्य में राज्यपाल का 5 वर्ष का कार्यकाल 7 जुलाई 2026 को बीत जाने के बाद भी नई नियुक्ति न किए जाने के मामले में दायर जनहित याचिका पर लंबी बहस सुनने के उपरांत अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। यह याचिका सामाजिक कार्यकर्ता एम ए खान की ओर से दायर की गई थी, जिसमें राष्ट्रपति के सचिव, भारत सरकार के विधि मंत्रालय और राज्यपाल के सचिव को अनावेदक पक्ष बनाया गया था। याचिकाकर्ता की तरफ से अदालत में पैरवी अधिवक्ता अजय रायजादा और अभिमन्यु सिंह ने की। प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए माननीय न्यायमूर्ति श्री आनंद पाठक एवं माननीय न्यायमूर्ति श्री बी पी शर्मा की खंडपीठ ने दोनों पक्षों के संवैधानिक तर्कों को दर्ज करने के बाद अपना निर्णय लंबित रखने की व्यवस्था दी।

​केंद्र सरकार के गजट नोटिफिकेशन का दिया हवाला

​अधिवक्ताओं ने अदालत के समक्ष आधिकारिक दस्तावेज प्रस्तुत करते हुए स्पष्ट किया कि भारत सरकार के राजपत्र में 8 जुलाई 2021 को जारी अधिसूचना के तहत तत्कालीन नियुक्ति केवल निर्धारित 5 वर्ष की अवधि के लिए ही प्रभावी थी। कानूनी प्रावधानों के तहत निश्चित समयसीमा पूरी होने के उपरांत पद पर निरंतरता बनाए रखने के बजाय वैधानिक प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य होता है। याचिका में यह बिंदु भी पुरजोर तरीके से उठाया गया कि जब तक नियमित संवैधानिक प्रमुख का चयन पूर्ण नहीं हो जाता, तब तक प्रशासनिक शून्यता से बचने के लिए राज्य के मुख्य न्यायाधीश को कार्यवाहक दायित्व सौंपने की सुस्थापित व्यवस्था रही है। केंद्र के संबंधित विभागों को इस विषय में अविलंब संज्ञान लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए थे ताकि राजभवन के दैनिक संवैधानिक कामकाज में किसी भी प्रकार का तकनीकी या विधिक व्यवधान उत्पन्न न हो सके।

​संवैधानिक मर्यादा और पूर्व की परंपराओं पर जोर

​याचिकाकर्ता पक्ष ने अपनी दलीलों में स्पष्ट किया कि शीर्ष संवैधानिक पदों पर समयबद्ध नियुक्तियां लोकतांत्रिक मर्यादा का प्रमुख आधार होती हैं। जब किसी संवैधानिक पद का तय समय समाप्त हो जाए तो वैकल्पिक प्रबंध तत्काल प्रभाव से अमल में लाए जाने चाहिए। देश में पूर्व में भी ऐसे कई मौके आए हैं जब नियमित चयन में विलंब होने की स्थिति में संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति को शपथ दिलाकर कार्यवाहक दायित्व का निर्वहन कराया गया था। अदालत से गुहार लगाई गई कि सक्षम प्राधिकारियों को तय सीमा में आवश्यक कदम उठाने के स्पष्ट निर्देश दिए जाएं ताकि विधिक असमंजस समाप्त हो। बेंच ने सभी पक्षों की दलीलें, पूर्व नजीरों और कानूनी बारीकियों को रिकॉर्ड पर लेने के बाद अंतिम निर्णय सुरक्षित घोषित कर दिया।

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