
जबलपुर। जबलपुर में स्वच्छ जल आपूर्ति व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त होने से कभी भी जहरीले पानी का भीषण प्रकोप फैल सकता है। नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के अध्यक्ष डॉ. पी.जी. नाजपांडे ने 20 अगस्त को महापौर जगत बहादुर सिंह अन्नू से मुलाकात के बाद नगर निगम से पेयजल तंत्र पर तुरंत श्वेत पत्र जारी करने की मांग उठाई है। मंच की अधारताल कार्यालय में आयोजित बैठक में मनीष शर्मा, सुशीला कनौजिया, गीता पांडे, पी.एस. राजपूत, यशवंत कोष्टा, श्याम सोलंकी, अशोक यादव और राममिलन शर्मा ने प्रशासन की अनदेखी पर रोष जताया। शहर की 60 प्रतिशत जलापूर्ति लाइनें गंदे नालों से होकर गुजर रही हैं, जबकि जिम्मेदार अफसरों के पास 20 प्रतिशत पुरानी पाइप लाइनों का कोई डेटा ही नहीं है। मरम्मत के लिए मिला 10 करोड़ रुपये का बजट भी बिना उपयोग पड़ा है।
गंदे नालों के भीतर दम तोड़ती जलापूर्ति
शहर की घनी बस्तियों और मुख्य सड़कों के नीचे बिछी जलापूर्ति व्यवस्था अब जनता की जान के लिए भारी जोखिम बन चुकी है। भयंकर सड़ांध, गंदगी और जहरीले कीचड़ से भरे नालों के बीच से गुजरने के कारण ये पाइप लगातार सड़ रहे हैं। नालियों के रिसाव से इन पाइपों में दूषित पानी मिलकर नलों तक पहुंच रहा है, जिससे किसी भी दिन संक्रामक बीमारी का विस्फोट हो सकता है। सबसे भयावह स्थिति यह है कि नगर निगम के तकनीकी अमले को जमीन के नीचे दबे अपने ही पाइप नेटवर्क की कोई जानकारी नहीं है। दशकों पुरानी इन लाइनों की वास्तविक स्थिति और दिशा का कोई अधिकृत दस्तावेज न होना प्रशासनिक लापरवाही की पराकाष्ठा है। बिना किसी तकनीकी जानकारी के पूरे शहर को अनजाने खतरे में धकेल दिया गया है।
बिना नक्शे और बजट कागजों में विकास
अमृत 1.0 योजना के क्रियान्वयन के समय भूमिगत पाइप नेटवर्क का डिजिटल नक्शा और विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करने में भारी उदासीनता बरती गई। इसी बुनियादी चूक के चलते अब अमृत 2.0 योजना के अंतर्गत भी इन जर्जर और सड़ी हुई लाइनों को बदलना पूरी तरह नामुमकिन हो गया है। पाइपों की सही लोकेशन न मिलने से जमीनी स्तर पर सुधार का पूरा काम ठप पड़ा है। एक तरफ आम नागरिक नलों से जहर जैसा पानी पीने को विवश हैं, वहीं दूसरी तरफ पाइप लाइनों को ठीक करने के लिए स्वीकृत हुआ 10 करोड़ रुपये का भारी-भरकम फंड तिजोरी में बंद पड़ा है। करोड़ों रुपये का बजट मौजूद होने के बावजूद काम न होना व्यवस्था की संवेदनहीनता को दर्शाता है।
