
जबलपुर। नगर निगम की भवन शाखा में इन दिनों हर काम के लिए रिश्वत तय कर खुला खेल चल रहा है। यहां बिना एडवांस रकम चुकाए कोई भी फाइल टेबल से आगे नहीं खिसकती। भवन अधिकारी, यंत्री और उपयंत्री के साथ समयपाल मिलकर इस अवैध वसूली को अंजाम दे रहे हैं। भ्रष्टाचार के मामलों में पहले हटाए गए एक दागी पूर्व अफसर का दखल आज भी शाखा के दैनिक फैसलों में बदस्तूर जारी है। व्यवस्था ऐसी बना दी गई है कि आम नागरिक चाहे जनसुनवाई में अर्जी दे, लोक सूचना अधिकार (आरटीआई)लगाए या 181 सीएम हेल्पलाइन पर गुहार लगाए, हर जगह सौदेबाजी तय है। फील्ड इंस्पेक्शन का नियम सिर्फ कागजों तक सीमित रह गया है और बिना मौके की जांच किए दफ्तर में बैठकर ही दस्तावेज निपटाए जा रहे हैं।
एडवांस वसूली के बिना आगे नहीं बढ़ती फाइलें
भवन शाखा में मकान निर्माण की अनुमति लेनी हो या किसी नक्शे को पास कराना हो, अधिकारियों ने दलालों और समयपालों के जरिए अपना नया अनौपचारिक नियम लागू कर दिया है। पीड़ित नागरिकों को साफ बता दिया जाता है कि नगर निगम के चक्कर काटने से कोई लाभ नहीं मिलेगा। काम तभी शुरू होगा जब तयशुदा नजराना पहले ही जमा कर दिया जाए। राशि एडवांस में मिलते ही बाबू से लेकर वरिष्ठ अफसरों के दस्तखत आसानी से हो जाते हैं। जो आवेदक नियमों का हवाला देकर इस अवैध वसूली का विरोध करते हैं, उनकी फाइलें महीनों तक जानबूझकर अटका दी जाती हैं। शहरवासियों का कहना है कि उच्च अधिकारियों से शिकायत करने की बात कहने पर भी इन कर्मियों पर कोई असर नहीं पड़ता, क्योंकि पूरा तंत्र आपस में एक राय होकर काम करता है।
आठ,पांच और तीन प्रतिशत की बंदरबांट
निगम की इस शाखा में आने वाली रिश्वत की रकम का बंटवारा बेहद सधे हुए अनुपात में किया जाता है। कुल कमीशन में 8% भवन अधिकारी के लिए, 5% इंजीनियरों के खाते में और 3% समयपाल के हिस्से में सीधे जाता है। इस तयशुदा प्रतिशत के चलते छोटे से बड़े हर काम के अलग-अलग रेट कार्ड चल रहे हैं। समयपाल खुलेआम वसूली का माध्यम बनते हैं और पूरी रकम इकट्ठा कर सभी संबंधित टेबलों पर बांटते हैं। इस संगठित मिलीभगत के कारण निर्माणकर्ता खुलेआम नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं और अधिकारी अपनी आंखें मूंदे बैठे हैं। हटाए जा चुके पुराने भ्रष्ट अधिकारी के इशारे पर फाइलों के सौदे अब भी तय हो रहे हैं, जिससे नए और पुराने तंत्र का गठजोड़ और अधिक मजबूत हो चुका है।
बिना मैदानी जांच घर बैठे बंटती अनुमतियां
नियमानुसार निर्माण स्थल पर जाकर उपयंत्रियों को भौतिक सत्यापन करना अनिवार्य होता है, लेकिन वर्तमान में मैदानी निरीक्षण पूरी तरह ठप पड़ा है। जर्जर भवनों को खतरनाक घोषित करना हो, अवैध कब्जों पर कार्रवाई करनी हो या पड़ोसियों के आपसी निर्माण विवाद सुलझाने हों, सबका फैसला रकम के आधार पर हो रहा है। पैसे मिलते ही खतरनाक इमारतों को सुरक्षित बता दिया जाता है और बिना अवैध निर्माण हटाए कागजों में मामला बंद कर दिया जाता है। सीएम हेल्पलाइन और जनसुनवाई जैसी व्यवस्थाएं जो जनता को राहत देने के लिए बनी थीं, वे अब केवल रिश्वत की नई दरें तय करने का मंच बनकर रह गई हैं। शिकायत वापस लेने का दबाव बनाकर आवेदकों को लगातार परेशान किया जाता है।
