
मेडिकल यूनिवर्सिटी के टुकड़े होने पर नेताओं की चुप्पी क्यों
जबलपुर। देश में पहली बार किसी मेडिकल यूनिवर्सिटी को तोड़ा गया है। महाराष्ट्र, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्यों में भी मेडिकल यूनिवर्सिटी एक ही है। ऐसे में जबलपुर मेडिकल यूनिवर्सिटी को ही क्यों बांटा गया। इस गंभीर सवाल को उठाते हुए आज नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शन मंच, भारतीय वरिष्ठ नागरिक एसोसिएशन, महिला समिति, सीनियर सिटीजन वेलफेयर एसोसिएशन तथा किसान समिति ने घंटाघर के पास जोरदार विरोध प्रदर्शन कर अपना भारी आक्रोश व्यक्त किया है। इन सभी संगठनों ने जबलपुर के सत्तापक्ष के जनप्रतिनिधियों के सामने बहुत बड़ा प्रश्न खड़ा किया है कि आखिर उन्होंने मेडिकल यूनिवर्सिटी के विखंडन पर अपनी आपत्ति क्यों नहीं दर्ज कराई। प्रदर्शन के दौरान डॉ. पीजी नाजपांडे, टी.के. राय घटक, डी.के. सिंह, सुभाष चन्द्रा, सुशीला कनौजिया, संतोष श्रीवास्तव, राजेश गिदरोनिया, उमा डाहिया, मनीषा अग्रहरि, ममता पटेल, पी.एस. राजपूत, हरजीवन विश्वकर्मा, अर्जुन कुमार परीड़ा, नन्दकिशोर सोनकर, दिलीप कुंडे, अशोक नामदेव, विनायक सोरते, के.सी. सोनी और अब्दुल रहमान सहित कई लोग प्रमुख रूप से शामिल रहे।
एक दिन शहर के पास क्या शेष रहेगा
जन संगठनों ने गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि जबलपुर में महत्वपूर्ण संस्थानों के टूटने और विखंडन का यह सिलसिला अब और कब तक लगातार चलता रहेगा। इससे पहले भी हाईकोर्ट, विद्युत मण्डल, कृषि विश्वविद्यालय तथा रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जैसी कई बड़ी संस्थाओं का विखंडन हो चुका है। इन सभी प्रतिष्ठित संस्थाओं के छिन जाने और टूटने की वजह से जबलपुर शहर का समग्र कद और महत्व काफी हद तक घट गया है। प्रदर्शनकारियों ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि शहर के हितों की अनदेखी का यह सिलसिला आगे भी इसी प्रकार जारी रहा, तो जनता और भी अधिक उग्र आंदोलन करने के लिए पूरी तरह से बाध्य होगी। इस पूरे घटनाक्रम के बाद से स्थानीय राजनीतिक गलियारों में हलचल बहुत तेज हो गई है और आम नागरिकों के बीच भी इस बात को लेकर खासी चर्चा बनी हुई है कि शहर के विकास और उसकी संस्थाओं को बचाने के लिए आगे की क्या ठोस रणनीति अपनाई जाएगी।
