
जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय द्वारा वर्ष 2014 में आयोजित 3 और 4 श्रेणी कर्मचारी भर्ती प्रक्रिया को रद्द करने के फैसले को अवैध ठहराया है। जस्टिस दीपक खोत की एकल पीठ ने याचिकाकर्ताओं शैलेंद्र कुमार मिश्रा आनंद परोची राजकुमार शर्मा मयूर परोहा और चंद्रशेखर रैदास के पक्ष में फैसला सुनाते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन को 3 महीने के भीतर मेरिट सूची के आधार पर पात्र अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र जारी करने का आदेश दिया है। इस मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता शशांक शेखर दुगवेकर सिद्धांत जैन भूपेश तिवारी आकाश चौधरी और धर्मेंद्र कुमार पांडे ने पैरवी की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना किसी ठोस कारण के पूरी चयन प्रक्रिया को निरस्त करना अनुचित है।
अदालत ने विश्वविद्यालय का पुराना आदेश रद्द किया
रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय ने 27 जून और 18 सितंबर 2014 को कर्मचारियों की भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया था। इसके बाद लिखित परीक्षा हुई और परिणाम घोषित होने पर कई योग्य अभ्यर्थी चयनित हो गए। सब कुछ सही चलने के बावजूद 24 अगस्त 2016 को विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद ने अचानक पूरी चयन प्रक्रिया ही रद्द कर दी। प्रशासन ने तर्क दिया था कि भर्ती में गड़बड़ी और पक्षपात की शिकायतें ईओडब्ल्यू और लोकायुक्त को प्राप्त हुई थीं। इसलिए पारदर्शिता बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया गया। इसके खिलाफ पीड़ित अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और डब्ल्यूपी 15786/2016 दायर कर न्याय की गुहार लगाई थी। यह मामला कई वर्षों से न्यायालय में विचाराधीन था।
बिना सबूत भर्ती निरस्त करना अनुचित ठहराया गया
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि केवल शिकायतों के आधार पर या ईओडब्ल्यू से जानकारी मांगने मात्र से यह साबित नहीं होता कि पूरी चयन प्रक्रिया दूषित थी। विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रामाणिक सबूत या पुख्ता कारण अदालत के सामने पेश नहीं किया जा सका जिससे सामूहिक रूप से भर्ती रद्द करने का फैसला सही साबित हो सके। सुप्रीम कोर्ट की नजीरों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि चयन सूची में नाम आने से किसी को नियुक्ति का अंतिम अधिकार नहीं मिल जाता। इसके बावजूद सरकार या यूनिवर्सिटी बिना स्पष्ट कारण के मनमाने ढंग से पूरी प्रक्रिया निरस्त नहीं कर सकती। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
पात्र अभ्यर्थियों को 3 माह में मिलेगी नियुक्ति
हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद द्वारा 2016 में पारित विवादित प्रस्ताव को अमान्य कर दिया है। इसके साथ ही पूर्व में तैयार चयन सूची पर कानून के अनुसार पुनर्विचार करने को कहा है। आदेश के अनुसार यदि कोई नई विधिक अड़चन न हो तो पात्र अभ्यर्थियों को 3 महीने के भीतर नौकरी दी जाए। यदि किसी चयनित उम्मीदवार को नियुक्ति देने में कानूनी बाधा आती है तो सक्षम प्राधिकारी को आदेश की सर्टिफाइड कॉपी मिलने के 3 महीने के भीतर कारण बताते हुए स्पीकिंग ऑर्डर पारित करना होगा। इस फैसले से लंबी कानूनी लड़ाई लड़ रहे युवाओं को बहुत बड़ी राहत मिली है।
