संजय पाठक से कोर्ट ने पूछा,जज का नंबर सेव नहीं था, तो फिर डायल कैसे हुआ !

Newzo
Newzo - News Editor 130 Views
4 Min Read

जबलपुर। कटनी के भाजपा विधायक संजय पाठक से जुड़े आपराधिक अवमानना मामले की सुनवाई पूरी हो गई है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने करीब 45 मिनिट की बहस के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। यह मामला जस्टिस विशाल मिश्रा को फोन कॉल करने के प्रयास से जुड़ा है। 1 सितंबर 2025 को जस्टिस मिश्रा ने अदालत में इस घटना का जिक्र किया था और संजय पाठक के परिवार की खदानों से संबंधित केस से खुद को अलग कर लिया था। हाईकोर्ट ने 2 अप्रैल को इसे प्रथम दृष्टया अवमानना मानते हुए नोटिस जारी किया था। विधायक संजय पाठक अब तक 3 बार व्यक्तिगत रूप से हाईकोर्ट में हाजिर हो चुके हैं। अब सभी की निगाहें हाईकोर्ट के आगामी निर्णय पर टिकी हैं।

जज को फोन करने पर छिड़ी कानूनी जंग

​सुनवाई के दौरान विधायक संजय पाठक की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अपना पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि विधायक ने कॉल तो किया था, लेकिन घंटी बजते ही उसे काट दिया था और बाद में एक मैसेज भी भेजा था। इस पर कोर्ट ने सवाल किया कि यदि नंबर सेव नहीं था, तो फिर डायल कैसे हुआ। मुकुल रोहतगी ने तर्क दिया कि मोबाइल में किसी का भी नंबर सेव हो सकता है और गलती से लगे कॉल के लिए विधायक ने बिना शर्त माफी मांग ली है। इस दौरान अनिल खरे, संपूर्ण तिवारी और शमिला इरम फातिमा ने भी अदालत में अपनी बात रखी।

शिकायतकर्ता ने कॉल रिकॉर्ड की मांग उठाई

​दूसरी तरफ, शिकायतकर्ता आशुतोष मनु दीक्षित की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। कामत ने कोर्ट में तर्क दिया कि जस्टिस मिश्रा के आदेश और विधायक के वकीलों के दावों में विरोधाभास है। उन्होंने मांग की कि मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए 30 अगस्त की कॉल डिटेल्स मंगवाई जानी चाहिए, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि कॉल केवल एक मिस्ड कॉल था या फोन पर बातचीत भी हुई थी। दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलों को सुनने के बाद डिवीजन बेंच ने अपना फैसला सुरक्षित रखने का आदेश दिया।

न्यायपालिका की मर्यादा पर बहस हुई तेज

​यह मामला न केवल एक विधायक और जज के बीच के संपर्क तक सीमित है, बल्कि न्यायिक अखंडता और निष्पक्षता से जुड़ा हुआ एक गंभीर मुद्दा बन गया है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकरण का निर्णय आने वाले समय में अदालती प्रक्रियाओं के प्रति लोगों के विश्वास को और अधिक मजबूत करेगा। जब से जस्टिस मिश्रा ने स्वयं को केस से अलग किया है, तब से ही राजनीतिक और कानूनी गलियारों में यह चर्चा का विषय बना हुआ है। अब कोर्ट के अंतिम आदेश से ही यह स्पष्ट होगा कि इस घटना को किस नजरिए से देखा जाएगा। फिलहाल, कटनी विधायक और उनके समर्थकों की नजरें पूरी तरह से हाईकोर्ट के फैसले पर केंद्रित हैं।

Share This Article
error: This Content is protected !!