
जबलपुर। मध्य प्रदेश में बहुप्रतीक्षित 27% ओबीसी आरक्षण के मसले पर हाईकोर्ट ने निर्णायक व्यवस्था दी है। लंबे समय से रोके गए 13% पदों के भविष्य को तय करते हुए पीठ ने माना कि प्रांतीय नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग की मौजूदगी पहले से संतोषजनक है। सुनवाई के दौरान राज्य प्रशासन यह पुख्ता प्रमाण पेश नहीं कर पाया कि संवैधानिक रूप से मान्य 50% की आरक्षण सीमा को पार करना किन अपरिहार्य कारणों से जरूरी हो गया था। प्रशासनिक स्तर पर किसी असाधारण आधार की अनुपस्थिति के चलते अनारक्षित और आरक्षित श्रेणियों के बीच वर्षों से जारी यह गतिरोध समाप्त हुआ है, जिससे अटकी पड़ी चयन प्रक्रियाओं को विधिक स्पष्टता मिल गई है।
पचास प्रतिशत की तय सीमा लांघना नामुमकिन
अदालत ने अवलोकन में रेखांकित किया कि आरक्षण के वर्तमान प्रतिशत में वृद्धि करने के लिए अकाट्य साक्ष्यों की दरकार होती है। शासन की तरफ से ऐसा कोई अनुभवसिद्ध विश्लेषण अथवा सर्वेक्षण रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया जो मौजूदा व्यवस्था से परे जाने को न्यायोचित ठहराता हो। सर्वोच्च मानकों के तहत कुल कोटे की 50% सीमा का अतिक्रमण केवल विरल परिस्थितियों में ही संभव है, जिनका अभाव इस मामले में स्पष्ट दिखा। पर्याप्त प्रतिनिधित्व का पूर्व विद्यमान ढांचा आरक्षण का अनुपात 27% तक बढ़ाने के कदम को विधिक आधार प्रदान करने में विफल रहा।
रुके हुए पदों पर बनी नई स्थिति
पूर्व में 87% पदों के परिणाम जारी कर 13% पदों को होल्ड पर रखने की जो अंतरिम व्यवस्था बनाई गई थी, उस पर अब संशय मिट गया है। कानूनी आधार के अभाव में इस अतिरिक्त हिस्से को आगे न बढ़ाए जाने से विभिन्न विभागों की चयन प्रक्रियाएं अब निर्धारित नियमों के भीतर पूर्ण होंगी। न्यायिक निष्कर्ष आने के बाद उन तमाम अभ्यर्थियों को दिशा मिली है जो परिणाम के इंतजार में उलझे थे। विधिक परीक्षण में सरकार का पक्ष पर्याप्त तथ्यों के अभाव में प्रभावी नहीं रहा, जिसके चलते संपूर्ण भर्ती प्रक्रिया को मानक आरक्षण सीमाओं के भीतर ही अंतिम रूप देने का मार्ग प्रशस्त हुआ है।
