
जबलपुर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की मुख्य पीठ ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण यानी कैट के 09 जनवरी 2026 के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार की याचिका प्रारंभिक स्तर पर ही पूरी तरह खारिज कर दी। यह पूरा मामला प्रांतीय पुलिस सेवा संवर्ग के हित में दायर स्टेट पुलिस सर्विस एसोसिएशन के मूल आवेदन से जुड़ा है, जिसकी कानूनी पैरवी एडवोकेट पंकज दुबे और एडवोकेट अक्षय खंडेलवाल कर रहे हैं। ट्रिब्यूनल ने दोनों सरकारों को अतिरिक्त आईपीएस कैडर समीक्षा 120 दिनों में पूरी करने के स्पष्ट निर्देश दिए थे, जिसे भारत सरकार ने चुनौती दी थी। उच्च न्यायालय ने प्रशासनिक पक्ष के तर्कों को अमान्य कर कैट का आदेश प्रभावी बनाए रखा, जिससे राज्य संवर्ग के पुलिस कर्मियों को बड़ी कानूनी जीत मिली है।
नियमों के तहत तय सीमा में काम जरूरी
अदालत ने संपूर्ण प्रशासनिक प्रक्रिया का परीक्षण करते हुए व्यवस्था दी कि भारतीय पुलिस सेवा संवर्ग नियम 1954 के वैधानिक मापदंडों का अनिवार्य रूप से पालन किया जाना चाहिए। केंद्र की ओर से दी गई यह दलील पूरी तरह अमान्य हो गई कि समीक्षा सामान्य क्रम में चल रही है और इसमें कोई अनुचित विलंब नहीं हुआ है। पीठ ने सख्त लहजे में स्पष्ट किया कि निश्चित समय-सीमा के भीतर पुनरीक्षण कार्य संपन्न करना शासन तंत्र की प्राथमिक वैधानिक जवाबदेही है। इसे केवल एक रूटीन अथवा सामान्य विभागीय प्रक्रिया बताकर अनिश्चितकाल तक टाला नहीं जा सकता।
राज्य पुलिस अफसरों को मिलेगा प्रमोशन का लाभ
इस फैसले के बाद अब मैदानी स्तर पर सेवारत योग्य पुलिस उपाधीक्षकों और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षकों के अखिल भारतीय संवर्ग में शामिल होने का मार्ग प्रशस्त होगा। अधिकरण के निर्देश पर अमल होने से प्रांतीय संवर्ग के अधिकारियों को केंद्रीय पदनाम मिलने की राह में आ रही प्रशासनिक बाधाएं दूर होंगी। पीठ ने साफ कर दिया कि केवल कागजी औपचारिकता दर्शाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पात्र कार्मिकों को समय पर पदोन्नति का वास्तविक सांविधिक लाभ सुनिश्चित कराना न्यायोचित आवश्यकता है।
