
जबलपुर सहित प्रदेश भर के नेताओं में असमंजस और प्रोटोकॉल प्रतीक्षा
जबलपुर। जबलपुर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष के तौर पर संदीप जैन और उपाध्यक्ष के रूप में प्रशांत केसरवानी की ताजपोशी के बाद कार्यकर्ताओं में काफी उत्साह देखा गया था। इन दोनों नेताओं के समर्थक मान रहे थे कि अध्यक्ष और उपाध्यक्ष बनने के साथ ही उन्हें क्रमशः कैबिनेट और राज्यमंत्री का प्रोटोकॉल प्राप्त हो जाएगा। हालांकि प्रशासनिक आदेश में हो रही लगातार देरी से जबलपुर के राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है। स्थानीय कार्यकर्ताओं की अपेक्षाएं पूरी कराने के लिए यह औपचारिक शक्ति बेहद जरूरी मानी जाती है। संदीप जैन और प्रशांत केसरवानी वर्तमान में बिना अतिरिक्त वैधानिक दर्जे के ही अपने दायित्वों का निर्वहन करने को विवश हैं। महाकौशल से लेकर राजधानी तक ऐसे नेताओं के दर्जे को लेकर फाइल की स्थिति पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।
ढाई तीन साल की लंबी जद्दोजहद के बाद नियुक्तियां
सत्तारूढ़ दल में सत्ता और संगठन के शीर्ष स्तर पर कई दौर के लंबे विचार-विमर्श चले। मार्च से जुलाई के मध्य अलग-अलग चरणों में सूची जारी कर करीब ढाई से तीन साल का सूखा खत्म किया गया था। इस कवायद में पूर्व जनप्रतिनिधियों, निष्ठावान कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ पदाधिकारियों को साधने का पूरा प्रयास किया गया था। सामान्य तौर पर राज्य में परंपरा रही है कि प्रमुख संस्थाओं के अध्यक्ष को कैबिनेट मंत्री और उपाध्यक्ष को राज्यमंत्री का दर्जा अलग से अधिसूचना जारी कर तुरंत प्रदान कर दिया जाता है। इस बार यह स्थापित प्रक्रिया ठंडे बस्ते में जाती दिखाई दे रही है। शासन स्तर पर अब तक इस संबंध में कोई ठोस नीतिगत कदम नहीं उठाया गया है।
अफसरशाही पर प्रभाव और कार्यकर्ता अपेक्षाओं का संकट
नवनियुक्त पदाधिकारियों के सामने सबसे गंभीर चुनौती प्रशासनिक मशीनरी के साथ समन्वय स्थापित करने में आ रही है। मंत्री स्तर का प्रोटोकॉल न होने से नौकरशाही इन पदाधिकारियों के पत्रों और दिशा-निर्देशों को अपेक्षित प्राथमिकता नहीं दे रही है। विभागीय स्तर पर जनसमस्याओं के निराकरण के लिए अफसरों पर वैसा प्रभाव नहीं बन पा रहा है जैसा पूर्ववर्ती कार्यकालों में देखा जाता था। क्षेत्र से आने वाले कार्यकर्ताओं को लगता है कि उनके नेता सरकार के शक्तिशाली अंग बन चुके हैं, जबकि धरातल पर अधिकारों की सीमाएं आड़े आ रही हैं। संगठन के भीतर अब यह चर्चा तेजी से चल रही है कि क्या सरकार इन नियुक्तियों को केवल सांकेतिक रखना चाहती है या आने वाले समय में इनके कामकाज की समीक्षा करके प्रशासनिक ताकत सौंपने पर विचार करेगी।
