
आईआरसीटीसी एजेंट की निजी आईडी से टिकट बुकिंग पर हाईकोर्ट की बड़ी राहत
व्यक्तिगत खाते से आरक्षण कराने पर रेलवे एक्ट की धारा 143 लागू नहीं होगी
जबलपुर । मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस हिमांशु जोशी की एकल पीठ ने रेलवे ई-टिकटिंग को लेकर अहम व्यवस्था दी है। अदालत ने सिंगरौली में सोनी साइबर कैफे चलाने वाले अधिकृत आईआरसीटीसी एजेंट अविनाश कुमार सोनी के विरुद्ध जबलपुर रेलवे कोर्ट में चल रहे आपराधिक प्रकरण को निरस्त कर दिया। वर्ष 2019 में रेलवे सुरक्षा बल ने जांच के दौरान पाया था कि वर्ष 2015 से मान्यता प्राप्त एजेंट अविनाश ने अपनी आधिकारिक आईडी के स्थान पर निजी यूजर आईडी से 2 सामान्य और तत्काल टिकट बुक किए थे। आरपीएफ ने इसे अवैध कारोबार मानते हुए रेलवे एक्ट की धारा 143 में चार्जशीट दायर की थी। अधिवक्ता विशाल डेनियल के तर्कों को स्वीकारते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल निजी आईडी उपयोग करने से कोई अधिकृत व्यक्ति गैर-कानूनी दलाल नहीं बन जाता।
आरपीएफ छापेमारी और याचिका दायर करने की कहानी
सुरक्षा बल की इस दंडात्मक कार्रवाई के विरोध में आरोपी पक्ष ने उच्च न्यायालय की शरण लेते हुए आपराधिक पुनरीक्षण याचिका प्रस्तुत की थी। बचाव पक्ष ने न्यायिक मंच पर यह प्रमाणित किया कि संबंधित कारोबारी को भारतीय रेलवे खानपान एवं पर्यटन निगम द्वारा विधिवत कार्यभार सौंपा गया था। इस अवधि में उनकी मान्यता को कभी निलंबित या निरस्त नहीं किया गया था। इस प्रकार व्यवस्था का हिस्सा रहते हुए यात्री सेवा प्रदान करने वाले व्यक्ति को बिना किसी अतिरिक्त वित्तीय अनियमितता के सीधे तौर पर असामाजिक तत्वों की श्रेणी में खड़ा करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
धारा 143 केवल अनधिकृत व्यक्तियों पर लागू होगी
विधिक प्रावधानों की व्याख्या करते हुए न्यायालय ने रेखांकित किया कि रेल कानून की इस विशेष धारा का मूल उद्देश्य उन तत्वों को रोकना है जो बिना किसी अनुमति के टिकटों की खरीद-फरोख्त का अवैध जाल फैलाते हैं। जब कोई व्यक्ति पहले से ही संस्थागत व्यवस्था से जुड़ा हो और उसके पास वाणिज्यिक संचालन की अनुमति मौजूद हो, तब उस पर दलाली निरोधक नियम सीधे लागू नहीं किए जा सकते। व्यक्तिगत प्रोफाइल से लॉगिन करना और संगठित अपराध के जरिए टिकटों की जमाखोरी करना सर्वथा भिन्न विषय हैं, जिन्हें एक ही तराजू में नहीं तौला जा सकता।
दलाली के साक्ष्य बिना कानूनी मुकदमा अनुचित
न्यायिक समीक्षा में यह बात सामने आई कि अभियोजन पक्ष ऐसा कोई भी दस्तावेजी साक्ष्य पेश करने में असमर्थ रहा जिससे अनैतिक माध्यमों का उपयोग साबित हो सके। अनुबंध के दायरे में सक्रिय व्यक्ति पर बिना किसी ठोस आधार के गंभीर आरोप तय करने का कोई औचित्य नहीं बनता। यह निर्णय देश भर में कार्यरत हजारों सेवा प्रदाताओं के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर बन गया है, जो तकनीकी अथवा व्यावहारिक परिस्थितियों में सामान्य आईडी का उपयोग करने के कारण मुकदमों के खतरे का सामना कर रहे थे।
